वीडियो जानकारी: 17.03.2024, बोध प्रत्यूषा, ग्रेटर नोएडा Title: आप और जगत — दोनों परस्पर आश्रित होकर शून्य हैं || आचार्य प्रशांत, शून्यता सप्तति पर (2024) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: संस्कारों के बिना अविद्या नहीं हो सकती। इसी तरह अविद्या के बिना संस्कार नहीं उत्पन्न हो सकते। ये परस्पर निर्भर होने के कारण स्वभाव-रहित हैं। ~ शून्यता सप्तति, (छंद 11) इस वीडियो में आचार्य जी ‘शून्यता सप्तति’ (छंद ११) पर चर्चा करते हुए समझा रहे है कि जीव और जगत दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं — इसीलिए दोनों का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं, वे शून्य हैं। आचार्य जी बताते हैं कि अहंकार और संसार के बीच की दूरी ही कामना और दुःख का कारण बनती है, और जब मनुष्य आत्मस्थ होता है तो वही दूरी मिट जाती है। आचार्य जी स्पष्ट करते है कि हमारी पसंद-नापसंद और निर्णय वास्तव में परिस्थितियों, समाज और समय का परिणाम हैं—इसी भ्रम को अहंकार कहते हैं। बौद्ध दर्शन इसे तृष्णा का दुख कहता है, वेदांत इसे आत्मा-ब्रह्म की एकता बताता है, और जैन मत इसे अनेकांतवाद से समझाता है। आचार्य जी बताते हैं कि या तो सबको अपना मानकर बचाओ, या फिर सचमुच शून्य हो जाओ—बीच का दोगलापन बिल्कुल छोड़ना होगा।