वीडियो जानकारी: 19.10.25, संत सरिता, ग्रेटर नोएडा Title : जो कहे ‘मैं मुक्त हूँ’ — वही सबसे गहरे बंधन में है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: इस वीडियो में आचार्य जी संत कबीर के भजन ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी, की पंक्तियाँ — “न मैं बँधा, न मैं मुक्ता, न मैं विरत, न रंगी हूँ” — पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी समझाते हैं कि ‘मैं’ स्वयं बंधन है, इसलिए जब तक ‘मैं’ बचा है, तब तक ‘मैं मुक्त हूँ’ जैसी घोषणा मूलतः झूठी और अहंकारजनित है। आचार्य जी बताते हैं कि सच्ची मुक्ति कोई उपलब्धि, अनुभव या दावा नहीं है। मुक्ति का अर्थ है बंधन की पहचान और उसके लोप का स्वाभाविक विद्रोह। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति ईमानदारी से स्वीकार करता है कि वह बंधन में है, उसी के भीतर वह अग्नि उत्पन्न होती है जो बंधनों को गलाती है; जबकि जो स्वयं को ‘मुक्त’ या ‘एनलाइटेंड’ घोषित करता है, वह झूठी आध्यात्मिकता के सबसे खतरनाक जाल में फँस जाता है।