वीडियो जानकारी: 16.09.2023, बोध प्रत्यूषा, ग्रेटर नोएडा Title : भेद दिखे तो विकार है, भेद मिटे तो ज्ञान || आचार्य प्रशांत, लाओत्सु पर (2023) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: ताओ जिसकी व्याख्या की जा सकती है वह सनातन ताओ नहीं है। नाम जिसकी व्याख्या की जा सकती है वह सनातन नाम नहीं है। वह जिसका कोई नाम नहीं है वह ही अंतिम सत्य है। नाम ही सभी सांसारिक वस्तुओं का स्त्रोत है। कामना से रहित होकर ही इस रहस्य को समझा जा सकता है। कामना के बंधन में सत्य नहीं दिखता, अभिव्यक्ति मात्र दिखती है। अभिव्यक्ति में ही रहस्य है। जहां रहस्य जितना गहरा होता है, वहीं अभिव्यक्ति उतनी सूक्ष्म व अद्भुत होती है। ~ ताओ ते चिंग (1) इस वीडियो में आचार्य जी लाओत्सु के सूत्र — “जिसका नाम लिया जा सके, वह अंतिम नहीं” — पर चर्चा कर रहे हैं। वे समझाते हैं कि नाम, विभाजन और “विशेष” का भाव कामना और अहंकार को बनाए रखते हैं; क्योंकि अहंकार केवल छोटे हिस्सों पर ही जी पाता है। जब वस्तु अनंत होती है, तब अहंकार उसे टुकड़ों में बाँटकर ही उसे “अपना” कह पाता है। वे समझते हैं पूर्ण का कोई नाम नहीं होता, क्योंकि जहाँ नाम है, वहाँ सीमा है। आचार्य जी बताते हैं कि वास्तविक भेद केवल नित्य-अनित्य या सार-असार का है, बाकी सभी भेद अहंकार की भूख से उपजे हैं। कामना पहले आती है, फिर वही साधारण रोटी और पिज्ज़ा, कोयला और हीरे जैसे झूठे अंतर बना देती है। लाओत्सु की कथाओं के माध्यम से वे समझाते हैं कि विवेक वहीं है, जहाँ मन नामों और विभाजनों के पार शांत होता है — जहाँ देखने पर भी देखने वाला नहीं रहता, और हर छोटी बात के पार उस एकत्व में विश्राम होता है, जिसे कहा तो नहीं जा सकता, पर जिसके बिना कुछ भी नहीं।