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न कहीं और, न कभी और, अभी के सिवा न कोई ठौर! || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर
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5 months ago
Description

वीडियो जानकारी: 04.05.25, संत सरिता, ग्रेटर नोएडा Title : न कहीं और, न कभी और, अभी के सिवा न कोई ठौर! || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: इश्क़ है आसमां में उड़ के जाना कि हर लम्हा सौ पर्दे उठाना सबसे पहले साँस से छुड़ाना जां को आख़िरी क़दम बिन पांव के ही उठाना देखना इस जहां को जैसे ना देखा अपनी नज़र को नज़र न मानना अरे ऐ दिल मेरे! मुबारक हो तुझे आशिक़ों के दायरे में दाख़िल हो जाना नज़र की पहुँच के पार लेना नज़ारे सीनों के गली-कूचों में दौड़ें मारना ऐ जान, कब आया तुझ में ये दम? ऐ दिल, कब से इस धड़कन को जाना? ~संत रूमी इस वीडियो में आचार्य जी संत रूमी की प्रसिद्ध पंक्ति “नज़र के पार नज़ारे” पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ आंखें बंद करके कल्पनालोक में चले जाना नहीं है, बल्कि अहंकार के पार जाकर इसी संसार को नए अर्थों में देखना है। वे बताते हैं कि इंसान लगातार नए अनुभवों—कपड़े, खाना, फ़िल्में, यात्राएँ—के पीछे भागता है, पर चैन कभी नहीं मिलता, क्योंकि अहंकार स्वयं बदलना नहीं चाहता। बेचैनी बनी रहती है और हम बार-बार उसी की ओर दौड़ते हैं जो आग को और भड़काता है। आचार्य जी समझाते हैं कि समय और स्थान का धोखा हमें वर्तमान से दूर करता है—हम “कभी और” या “कहीं और” में शांति खोजते हैं, जबकि सत्य हमेशा “अभी और यहीं” में है। जब भीतर शोधन होता है और अहंकार पार हो जाता है, तब यही जीवन, यही संसार स्वर्ग की तरह प्रकट होता है। आचार्य जी समझाते हैं कि जीवन का सार “सही प्रेम” और “सही रण” में है—भीतर की सफाई से ही बाहर की दुनिया आनंद और मुक्ति का स्रोत बनती है।