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असली संस्कार वही है जो गंदगी हटाकर खुद मिट जाए || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025)
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Description

वीडियो जानकारी: 09.08.25, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा Title : असली संस्कार वही है जो गंदगी हटाकर खुद मिट जाए || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ।। हिन्दी अनुवाद: जब चित्त पूरी तरह संयमित होकर आत्मा में ही स्थित रहता है, तब वह सभी कामनाओं से निःस्पृह होकर 'युक्त' (योग में स्थित) कहा जाता है। काव्य: भ्रम मिटा जाले हटे दुर्बलता के तर्क कटे स्वार्थ घटा संयम जगा योगी निज भीतर डटा इस वीडियो में आचार्य जी भगवद् गीता के अध्याय 6 श्लोक 18 पर चर्चा कर रहे है । आचार्य जी स्पष्ट कर रहे हैं भीतरी क्षेत्र आत्मा नहीं, बल्कि अंतःकरण है। आचार्य जी अंतःकरण के चार पहलुओं — मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को समझाते है । आचार्य जी बताते हैं कि चित्त (स्मृतियाँ और संस्कार) ही बंधन का मूल है और इन्हें सत्य में समर्पित किए बिना मुक्ति नहीं मिलती। चुप्पी अक्सर अहंकार की चाल है — अस्पष्टता में अहंकार छिप कर सच्चाई से बचता है। आचार्य जी समझाते है कि चित्त को आत्मस्थ करना ही योग है और संस्कारों से मुक्ति आवश्यक है । स्मृतियाँ व संस्कार पहचान कर छोड़ने से ही सच्ची आंतरिक स्वतंत्रता मिलती है।