वीडियो जानकारी: 11.11.24, वेदांत संहिता, ग्रेटर नोएडा Title : कहाँ मिलेगा असली नयापन? || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी । निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ ८ ॥ ~अष्टावक्र गीता (11.8) हिंदी अनुवाद: विभिन्न प्रकार के आश्चर्यों से भरा यह संसार कुछ भी नहीं है - ऐसा जानने वाला निष्काम और स्वतःस्फूर्त हो, शुद्धता और शांति को प्राप्त होता है ॥ 8 ॥ इस वीडियो में आचार्य जी अष्टावक्र गीता के अध्याय 11, श्लोक 8 पर चर्चा कर रहे हैं और समझा रहे हैं कि हम जिन चीज़ों को "नई" या "अद्भुत" मानते हैं, वे असल में नई नहीं होतीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपने आस-पास की चीज़ों को गहराई से नहीं देखते। जब समझ नहीं होती तो हर चीज़ हमें चौंकाने लगती है। लेकिन जो अपने जीवन की छोटी-छोटी बातों को भी सही से देख लेता है, उसके लिए कुछ भी नया या आश्चर्यजनक नहीं बचता। आचार्य जी बताते हैं कि "आश्चर्य" से कामना पैदा होती है, और कामना के साथ डर भी आता है। इंसान हमेशा बाहर से कुछ पाने या खोने की चिंता करता रहता है, इसलिए दुखी रहता है। लेकिन जब समझ आता है कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें पूरा कर सके, तब जीवन सहज हो जाता है।