वीडियो जानकारी: 13.07.25, वेदांत संहिता, गोवा Title : अध्यात्म: लाभ-हानि का गणित नहीं, एक अकारण प्रेम यात्रा || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2025) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: एवमेव कृतं येन सकृतार्थो भवेदसौ । एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ ॥ ८ ॥ ~ अष्टावक्र गीता (12.8) हिन्दी अनुवाद: जिनके द्वारा ठीक इसी प्रकार कर्म होता है, वे कृतार्थ (जीवन के उद्देश्य को प्राप्त) होते हैं। जिनका स्वभाव भी ठीक ऐसा ही होता है, वे भी कृतार्थ (जीवन के उद्देश्य को प्राप्त) होते हैं। इस वीडियो में आचार्य जी अष्टावक्र गीता के अध्याय 12 के श्लोक 8 पर चर्चा कर रहे है ।आचार्य जी ज्ञान से मिलने वाले कथित “लाभों” पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी स्पष्ट कर रहे हैं कि जब तक साधक “मुझे क्या मिला?” जैसे सवालों में फँसा है, वह अभी भी अपने ही पिंजरे में बंद है। आचार्य जी समझाते हैं कि असली ज्ञान आपको कोई छोटी-मोटी सुविधा नहीं देता, बल्कि जीवन को कृतार्थ कर देता है—जहाँ पाने और करने को कुछ शेष नहीं रहता। वह बताते हैं कि सत्य की तुलना संसार से करना, या लाभ तौलना, ज्ञान का अपमान है और साधक को कैद में ही बनाए रखता है। आध्यात्मिक मार्ग लाभ-हानि की गणित नहीं, बल्कि अकारण प्रेम की यात्रा है, जहाँ चलते हुए शुरुआत में गिरना-टकराना स्वाभाविक है। जो सच में पा लेता है, वह बता ही नहीं सकता—जो बताने बैठा है, समझो अभी उड़ नहीं पाया है।