वीडियो जानकारी: 14.08.2024, संत सरिता, गोवा Title : न आकाश में, न मंदिर में — वो आपके घट में है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2024) ➖➖➖➖➖➖ विवरण: पानी में मीन पियासी, मोहि सुन सुन आवत हाँसी।। आतमज्ञान बिना नर भटके, कोई मथुरा कोई काशी। जैसे मृगा नाभि कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी।। जल विच कमल कमल विच कलियाँ, तापर भँवर निवासी। सो मन बस त्रयलोक भयो है, यती सती संन्यासी।। जाको ध्यान धरे विधि हरिहर, मुनिजन सहस अठासी। सो तेरे घट माहिं बिराजे, परम पुरुष अविनासी।। है हाज़िर तेहि दूर दिखावे, दूर की बात निरासी। कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।। ~ संत कबीर इस वीडियो में आचार्य जी संत कबीर के भजन “पानी में मीन प्यासी” की पंक्ति — “जाको ध्यान धरे विधि हरिहर, मुनिजन सहस अठासी। सो तेरे घट माहिं बिराजे, परम पुरुष अविनासी।।” पर चर्चा कर रहे हैं। आचार्य जी बताते हैं कि यह उस परम सत्य की ओर संकेत है जो नाम, रूप और कल्पना से परे है। देवता और मुनि भी जिसका ध्यान करते हैं, वह बाहर नहीं, भीतर—“तेरे घट माहीं” विद्यमान है। जब मनुष्य नेति-नेति द्वारा अहं को घटाता है, तो वही परम पुरुष स्वयं प्रकट होता है। यही आत्मज्ञान और मुक्ति का मार्ग है—जहाँ कर्म चलता है, पर भीतर दृष्टा स्थिर रहता है। आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि साधना का अर्थ आँखें बंद कर के किसी रहस्यमयी वस्तु को खोज लेना नहीं, बल्कि खुली आँखों से अपनी ही गतिविधियों, अपने ही केंद्र को देखना है। आचार्य जी बताते हैं कि बाहरी भगवान आस्था से मिलते हैं, पर भीतरी भगवान ज्ञान से। वही “अविनाशी” सत्य है, जो कभी उत्पन्न नहीं होता, कभी समाप्त नहीं होता, और सदैव घट में ही विराजमान रहता है।