क्लाइमेट चेंज + जाका गला तुम काटिहो + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

क्लाइमेट चेंज + जाका गला तुम काटिहो + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

दो पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
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Description
सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
क्लाइमेट चेंज + जाका गला तुम काटिहो + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

क्लाइमेट चेंज:

आज के समय में क्लाइमेट चेंज मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। अत्यधिक बढ़ता तापमान, बिगड़ता वर्षा चक्र, अनियमित हवाएँ व तूफान, विलुप्त होती प्रजातियाँ, पिघलते ग्लेशियरों के कारण बढ़ता समुद्र जलस्तर - ये सब क्लाइमेट चेंज के कुछ प्रभाव है।

हम सिक्स्थ मास एक्स्टिंक्शन फ़ेज़ (छठे महाप्रलय) में प्रवेश कर चुके हैं। प्रजातियों की विलुप्ति दर आज साधारण दर से बढ़कर हज़ार गुना हो गई है। हम त्वरित गति से अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहे हैं और महत्वपूर्ण बात ये है कि इस विनाश का कारण भी हम खुद ही हैं।

वेदान्त कहता है — हमारे बाहर के सब कर्म हमारी भीतरी बेचैनी की अभिव्यक्ति होते हैं। हम नहीं जानते कि हम कौन हैं, हम यहाँ किसलिए हैं, हमारी वास्तविक ज़रूरत क्या है, इसलिए हम अन्तहीन भोग करते हैं, प्रजनन करते हैं और एक अर्थहीन जीवन जीते हैं।

लेकिन क्या ये भोग और भोग की वस्तुएँ हमारे मन के खालीपन को भर पा रही हैं? इतना भोग करने पर भी वो भीतरी बेचैनी घटने की बजाय और बढ़ती क्यों जा रही है?

इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने समझाया है कि कैसे मन की बेचैनी और उसको मिटाने की अनंत अज्ञान भरी कोशिशों का ही परिणाम क्लाइमेट चेंज है। यह पुस्तक क्लाइमेट चेंज के अर्थ और खतरनाक प्रभावों के साथ उसके असल कारण को समझने और उस ज्ञान से उठे असली समाधान तक पहुँचने में किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत मददगार है।

जाका गला तुम काटिहो:

शाकाहार तभी सार्थक है जब वह आत्मज्ञान से फलित हो। संस्कारगत आया हुआ शाकाहार बड़ा व्यर्थ है।

अध्यात्म एक बूटी है जिसके फायदे हज़ार हैं। सच आएगा जीवन में तो अहिंसा भी आएगी, अवैर भी आएगा, अपरिग्रह भी आएगा, अस्तेय भी आएगा। जानवर कट ही इसलिए रहे है क्योंकि आदमी के जीवन में सच नहीं है।

हम जानते ही नहीं है कि 'हम हैं कौन'। हम जानते ही नहीं है कि 'खाना' माने होता क्या है!

हम उपभोगवादी युग में जी रहे है। जो कुछ भी दिख रहा है, वो हमारे लिए बस भोग की एक वस्तु है। वो इसलिए, क्योंकि 'अध्यात्म' को तो हमने कूड़ा-करकट समझकर के बिलकुल फेंक दिया है।

जब आप अध्यात्म को फेंक देते हो 'कूड़ा' जानकर, तो जीवन में ज़बरदस्त अपूर्णता आ जाती है। उसी अपूर्णता से फलित होता है माँसाहार।
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