शिवोहम् + ज्वाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

शिवोहम् + ज्वाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

दो पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
शिवोहम् + ज्वाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

शिवोहम्:

शिव माने बोध। ऋभुगीता कहती है कि शिव प्रकाश रूप हैं। उस प्रकाश में, उस रोशनी में ख़ुद को देखो। अपनी हालत, अपनी ज़िंदगी को देखो। यही महाशिवरात्रि का पर्व है।

इंसान की जो जड़ है, इंसान का जो केंद्र बिंदु है, उसकी तरफ़ इशारा करने के लिए ‘शिव’ शब्द की रचना हुई। शिव कोई व्यक्ति थोड़े ही हैं। वो कोई ऐसी इकाई नहीं हैं जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं, और शिव मन की मंज़िल हैं, मन का केंद्र हैं, मन की प्यास हैं।

शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव हमारे सब किस्सों का लक्ष्य हैं, गंतव्य हैं। शिव को भी एक और किस्सा मत बना लो, देवता मत बना लो। पर मन को देवताओं के साथ सुविधा रहती है क्योंकि देवता हमारे ही जैसे हैं – खाते-पीते हैं, चलते हैं। उनके भी हाथ-पाँव हैं, वाहन हैं, लड़ाइयाँ करते हैं, पीटे जाते हैं। उनकी भी पत्नियाँ हैं, उनकी भी कामनाएँ हैं। तो शिव को भी देवता बना लेने में हमें बड़ी रुचि रहती है। पर अगर यह कर लोगे तो अपना ही नुक़सान करोगे।

शिव न देवता हैं, न भगवान् हैं, न ईश्वर हैं; सत्य मात्र हैं। अंतर करना सीखो!

ज्वाला:

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन महापुरुषों के जीवन के उस संघर्ष से हम सबको परिचित करा रहे हैं, जो आम जनमानस तक आज तक नहीं पहुँच पाया है। आज भले ही हमने उन्हें महापुरुष कहकर सम्मानित किया है लेकिन जीवित रहते हुए उन्होंने केवल बाहरी ताकतों से ही नहीं, बल्कि सालों से हमारे अपने समाज द्वारा आत्मसात की गई रूढ़ियों, अंधविश्वास और ग़ुलामी की वृत्ति से लड़ाई की ताकि हम बंधनमुक्त और गरिमापूर्ण जीवन की ओर अग्रसर हो सकें।
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