नहिं मानै मूढ़ गँवार + जिन सतगुरु पहचाना नहीं + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
दो पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! नहिं मानै मूढ़ गँवार + जिन सतगुरु पहचाना नहीं + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
जिन सतगुरु पहचाना नहीं:
कबीर साहब का भजन “जिन सतगुरु पहचाना नहीं” मनुष्य की उस गहरी भटकन पर चोट करता है जिसमें वह शांति, मुक्ति और सत्य तो चाहता है, पर उन्हें पहचान नहीं पाता।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इस प्रसिद्ध भजन की व्याख्या करते हैं जिसका केंद्रीय संदेश यही है: समस्या चाह की कमी नहीं, पहचान की कमी है। “जिन सतगुरु पहचाना नहीं” का गहरा आशय बाहरी गुरु की पहचान भर नहीं है। आचार्य प्रशांत पुस्तक में स्पष्ट करते हैं कि सतगुरु को पहचानने की पहली शर्त है अपनी बीमारी/समस्या को पहचानना। जब तक मनुष्य भीतर पराश्रयता, भय, भ्रम और आदतों से संचालित होने की वृत्ति को नहीं देखता, तब तक वह सही गुरु, सही ज्ञान या सही मार्ग भी कैसे पहचान सकता है?
नहिं मानै मूढ़ गँवार:
कबीर साहब का भजन “नहिं मानै मूढ़ गँवार” मनुष्य के भीतर बैठी उस आत्मरक्षा की वृत्ति पर प्रकाश डालता है जिसके कारण संतों, ऋषियों और विचारकों को बार-बार एक ही बात को अलग-अलग तरीकों से कहना पड़ता है। बात सीधी होती है, पर अहंकार उसे स्वीकार नहीं करना चाहता।
प्रस्तुत पुस्तक में भजन की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अहंकार अपनी अलग सत्ता बचाए रखना चाहता है जिसके लिए वह कल्पनाओं, मान्यताओं और झूठी धारणाओं की दीवारें खड़ी करता है, और अपने ही बंधनों को सुरक्षा का नाम दे देता है। संत-जन सदियों से इसी दीवार को तोड़ने का करुणापूर्ण प्रयास करते आए हैं, ताकि मनुष्य अपने बंधनों को देख सके।