मन + भावनाएँ + अकेलापन और निर्भरता + स्त्री + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
चार पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए चार पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! मन + भावनाएँ + अकेलापन और निर्भरता + स्त्री + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
मन:
मन क्या है? मन अपनेआप में एक व्यवस्था है जिसमें तमाम विचारों और भावनाओं की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। मन को वास्तव में कहीं पहुँचना नहीं है। बल्कि इच्छा करना, इच्छित वस्तु को पाना, भोगना, फिर असन्तुष्ट हो जाना, फिर इच्छा करना, इसी दुष्चक्र में घूमते रहना मन का प्रयोजन है। मन की प्राकृतिक व्यवस्था में ऊँचाई या गहराई के लिए कोई जगह नहीं है।
जहाँ तक हमारी बात है, हमारा प्रयोजन है एक आज़ाद और भरपूर जीवन जीना जिसमें कोई चक्रवत बाध्यता न हो। पर मन में उठती लहरें हमारे नियन्त्रण में नहीं होती हैं। मन हमसे पूछकर नहीं चल रहा होता। हाँ, हम ज़रूर मन के ग़ुलाम बन जाते हैं। तो मन के अनुसार चलने का मतलब ही है एक बहुत-बहुत गहरी ग़ुलामी।
प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत हमें बताते हैं कि मन की दासता में जीना कोई अनिवार्यता नहीं है। मन तो अहम् की छाया मात्र है, तुम अपनेआप को जैसे परिभाषित करोगे, तुम अपनी जो मान्यता रखोगे, मन वैसा ही हो जाएगा। तो मन की सूक्ष्मताओं को गहराई से समझने और आपको मन के पार ले जाने में यह पुस्तक अवश्य सहायक सिद्ध होगी।
भावनाएँ:
हमारी ज़िन्दगी पर भावनाऍं अक्सर बहुत हावी रहती हैं और सिर्फ़ भावनाओं के चलाए ही हम चल रहे होते हैं।
क्या हैं भाव? जिसे हम भाव कहते हैं, वो और कुछ नहीं है, वो विचार ही है जो घना हो गया है।
भावनाऍं अपने आपमें न अच्छी हैं न बुरी हैं — भावनाऍं बाहरी हैं। बाहर से कोई भी विचार भीतर प्रवेश करता है और उसी को आप अपना भाव बोलने लगते हैं। फिर हमारी पसंद-नापसंद, हमारे चुनाव और पूरा जीवन उन्हीं भावों के चलाए चलते हैं।
भाव शारीरिक हैं, पशुओं में भी होते हैं, और वेदान्त कहता है तुम चेतना हो। आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक आपको आपके भावों और उनके स्रोत से परिचित करवाने का एक प्रयास है। जिससे कि आपके चुनाव भाव आधारित नहीं, बोध आधारित हों, आत्मिक हों।
अकेलापन और निर्भरता:
अकेलेपन का डर हमें अक्सर हमारे जीवन को अन्य वस्तुओं से भरने पर मजबूर कर देता है। वहीं से उन वस्तुओं के प्रति आसक्ति का जन्म होता है, जिसके कारण हमें जीवन में न जाने कितना दुःख भोगना पड़ता है। यदि इस डर को गहराई से समझा जाए तो जीवन सरल और बोधपूर्ण हो जाएगा। यह पुस्तक हमें उस डर के पार ले जाने का एक प्रयास है।
स्त्री:
आज़ाद जीवन एक आज़ाद मन की अभिव्यक्ति है। यदि व्यक्ति का मन मुक्त नहीं है तो मुक्ति आंदोलन शायद ही कभी अपने उद्देश्य की पूर्ति कर पाएँगे। स्त्री का वस्तुकरण ही उसकी दासता का प्रमुख कारण है।
इस दासता से मुक्ति तभी सम्भव है जब स्त्री ख़ुद को वस्तु-मात्र न समझे। दुनिया स्त्री का शोषण करती है उसे एक भौतिक वस्तु जानकर, और स्त्री उस शोषण को सहती है क्योंकि देह से उसने अपना तादात्म्य बैठा लिया है।
इस अति महत्वपूर्ण पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने करुणापूर्वक शरीर का सही स्थान बताया है, उसके आग्रहों पर सुझाव दिया है, और स्त्री के मन की मुक्ति के मार्ग पर प्रकाश डाला है, जो कि ना केवल उसे आंतरिक बल प्रदान करता है बल्कि उसकी उच्चतम की ओर यात्रा को एक उड़ान देता है।