जिन सतगुरु पहचाना नहीं + भूले मन समुझ के लाद लदनिया + चलना है दूर मुसाफ़िर + नहिं मानै मूढ़ गँवार + माया तजूँ तजि नहिं जाइ + वारि जाऊँ मैं सतगुरु के + जो मैं बौरा तो राम तोरा + मन मस्त हुआ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
आठ पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए आठ पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! जिन सतगुरु पहचाना नहीं + भूले मन समुझ के लाद लदनिया + चलना है दूर मुसाफ़िर + नहिं मानै मूढ़ गँवार + माया तजूँ तजि नहिं जाइ + वारि जाऊँ मैं सतगुरु के + जो मैं बौरा तो राम तोरा + मन मस्त हुआ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
जिन सतगुरु पहचाना नहीं:
कबीर साहब के इस प्रसिद्ध भजन की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत बताते हैं कि समस्या चाह की कमी नहीं, बल्कि सही पहचान की कमी है। यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि सतगुरु को पहचानने की शुरुआत अपनी समस्या, भय, भ्रम और पराश्रयता को पहचानने से होती है।
भूले मन समुझ के लाद लदनिया:
यह पुस्तक बताती है कि जीवन की समस्या कमी नहीं, बल्कि वह अनावश्यक बोझ है जिसे हम सहारा समझकर ढोते रहते हैं। आचार्य प्रशांत स्पष्टता के माध्यम से जीवन को हल्का और मुक्त बनाने का मार्ग दिखाते हैं।
चलना है दूर मुसाफ़िर:
जीवन एक अनवरत यात्रा है और मनुष्य उसका यात्री। यह पुस्तक माया-मोह की गाँठों को पहचानने और वेदांत की शिक्षा को जीवन में उतारने की स्पष्टता देती है।
नहिं मानै मूढ़ गँवार:
कबीर साहब के इस भजन की व्याख्या में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अहंकार अपनी झूठी धारणाओं और मान्यताओं को बचाए रखना चाहता है। यह पुस्तक उन बंधनों को पहचानने और उनसे मुक्त होने की दिशा दिखाती है।
माया तजूँ तजि नहिं जाइ:
धन माया है! स्त्री माया है! घर-परिवार माया है!
यह पुस्तक 'माया' की पारंपरिक और वास्तविक समझ के अंतर को स्पष्ट करती है। यह माया को छोड़ने की नहीं, बल्कि उसे सही रूप में समझने की दिशा में ले जाती है, जिससे जीवन अधिक सहज और स्पष्ट बनता है।
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के:
गुरु तुम्हें कुछ देता नहीं है, वो तुम्हें पैदा करता है।
आचार्य प्रशांत इस भजन की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि सच्चा समर्पण भावुकता नहीं, बल्कि ज्ञान की अंतिम परिणति है। यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि भक्तियोग और ज्ञानयोग अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।
जो मैं बौरा तो राम तोरा:
यह पुस्तक अहंकार, मान्यताओं और झूठी स्वतंत्रता की परतों को खोलते हुए दिखाती है कि स्पष्टता ही सही निर्णयों और मुक्त जीवन का आधार है। यह अपनी धारणाओं को पहचानकर उनसे ऊपर उठने का आमंत्रण है।
मन मस्त हुआ:
कबीर साहब का यह भजन आत्मबोध से मिलने वाली वास्तविक मस्ती और आनंद की ओर संकेत करता है। भजन को गाने मात्र से जो आनंद आता है, यह पुस्तक आपको उस आनंद की जड़ तक ले जाने का आमंत्रण है।
यदि आप इस मस्ती को सिर्फ़ छूना नहीं, जीना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है।