भूले मन समुझ के लाद लदनिया + मन मस्त हुआ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

भूले मन समुझ के लाद लदनिया + मन मस्त हुआ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

दो पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
भूले मन समुझ के लाद लदनिया + मन मस्त हुआ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

भूले मन समुझ के लाद लदनिया:

प्रस्तुत पुस्तक कबीर साहब के भजन “भूले मन समुझ के लाद लदनिया” पर आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या है। पुस्तक में वे स्पष्ट करते हैं कि जीवन की समस्या कमी नहीं; समस्या यह है कि हमने अपने ऊपर बहुत कुछ ऐसा लाद लिया है जिसे हम सहारा समझते हैं—हमारे संबंध, सपने, उपलब्धियाँ, भविष्य की योजनाएँ, और यहाँ तक कि रत्न-पत्थर, ध्यान की विधियाँ, हीलिंग और रिट्रीट जैसे ऊपरी उपाय। इस सबमें अक्सर बोझ उतारने निकला मन और ज़्यादा बोझ लेकर लौटता है।

यह पुस्तक कोई नई विधि या उपाय नहीं देती; यह आंतरिक स्पष्टता की ओर ले जाती है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि संसार से संबंध रखना ही होगा। पर प्रश्न है: क्या वह संबंध आपको हल्का कर रहा है या और भारी? क्या वह आपकी पुरानी गाँठ खोल रहा है या एक नई गाँठ बाँध रहा है? क्या वह आपको स्पष्टता दे रहा है या बस एक और आदत, एक और आसरा, एक और निर्भरता?

मन मस्त हुआ:

कबीर साहब द्वारा रचा यह भजन उस मस्ती को प्रकट करने का प्रयास है, जिसकी तलाश में हम सभी रहते हैं।
कभी वे इस मस्ती को हीरा कहते हैं, कभी हल्केपन से जोड़ते हैं, कभी हंस को मिले मानसरोवर की उपमा देते हैं, और कभी साहब के मिल जाने की बात करते हैं।

भजन की हर पंक्ति का पहला भाग उपमाओं के माध्यम से उस मस्ती को प्रकट करता है, और दूसरा भाग एक सहज प्रश्न उठाता है—जब इतना ऊँचा कुछ मिल गया है, जब जीवन में स्पष्टता का प्रकाश आ गया है, तो अब क्या संदेह बचा?
भजन को गाने मात्र से जो आनंद आता है, यह पुस्तक आपको उस आनंद की जड़ तक ले जाने का आमंत्रण है।

यदि आप इस मस्ती को सिर्फ़ छूना नहीं, जीना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है।
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