भारत + ज्वाला + जात + अंधविश्वास + क्लाइमेट चेंज + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पाँच पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए पाँच पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! भारत + ज्वाला + जात + अंधविश्वास + क्लाइमेट चेंज + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
भारत:
भारत को महान अगर कहने में रुचि रखते हो तो ख़ुद महान बनो, तुमसे ही है भारत की महानता। भारतीय अगर महान नहीं तो भारत महान कैसे हो सकता है?
बहुत महान लोग हुए हैं इस धरती पर। धर्म का पालना रहा है भारत, और विज्ञान का, और गणित का, और संगीत का भी पालना रहा है भारत ― इसलिए भारत महान था। उन लोगों की बदौलत भारत महान था।
आज भी वैसे लोग चाहिए। वैसे लोग होंगे तो भारत महान होगा, नहीं तो नहीं होगा। फिर ये तो कह लोगे कि इतिहास में पहले भारत महान था लेकिन ये नहीं कह पाओगे कि भारत आज भी महान है।
आज भारत को महान बनाना है तो अपने भीतर लोहा पैदा करो और सच की तरफ़ निष्ठा पैदा करो।
ज्वाला:
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन महापुरुषों के जीवन के उस संघर्ष से हम सबको परिचित करा रहे हैं, जो आम जनमानस तक आज तक नहीं पहुँच पाया है। आज भले ही हमने उन्हें महापुरुष कहकर सम्मानित किया है लेकिन जीवित रहते हुए उन्होंने केवल बाहरी ताकतों से ही नहीं, बल्कि सालों से हमारे अपने समाज द्वारा आत्मसात की गई रूढ़ियों, अंधविश्वास और ग़ुलामी की वृत्ति से लड़ाई की ताकि हम बंधनमुक्त और गरिमापूर्ण जीवन की ओर अग्रसर हो सकें।
जात
जातिप्रथा एक जन्मगत भेद है व्यक्ति और व्यक्ति के बीच; जिसमें माना जाता है कि जन्म से ही एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अलग है। यह भेद और अधिक वीभत्स रूप ले लेता है जब माना जाता है कि एक श्रेष्ठ है और दूसरा निम्न। आचार्य प्रशांत प्रस्तुत पुस्तक में इस विषय को गहराई से विश्लेषित करते हैं। आचार्य प्रशांत इसे एक सामाजिक समस्या से पहले एक भीतरी समस्या बताते हैं। वे कहते हैं कि जाति हमारी अज्ञानता की उपज है; दूसरे को दूसरा समझना ही मूल समस्या है।
आचार्य प्रशांत इसके समाधान के लिए हमें उपनिषद् और वेदान्त की ओर ले चलते हैं। वे कहते हैं — चूँकि जाति शारीरिक और मानसिक तल पर ही होती है, इसलिए जाति तब तक रहेगी जब तक हम उसे मान्यता देंगे जो जन्मा है, जो जात है। वेदान्त उसकी बात करता है जो अजात है, और मात्र उसी तल पर एकत्व है। पर उस अजात को समझा नहीं जा सकता जब तक हम जात को न समझें।
इस पुस्तक में उस जात को ही गहराई से समझाया गया है। और इस जात की समझ से ही जाति का उन्मूलन संभव है।
अंधविश्वास:
तथ्यों की उपेक्षा और मान्यताओं को अंगीकार करने के फलस्वरूप मानवता सदियों से अंधविश्वासों की चपेट में रही है और उनके दुष्परिणाम झेलती रही है। अंधविश्वास ने व्यक्ति के जीवन को डरा-सहमा और संकुचित बना डाला है।
जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, अदृश्य शक्तियाँ, ज्योतिष व हस्तरेखा — इन तमाम सामाजिक विद्रूपताओं की मूल वजह अंधविश्वास ही है। आज के समय की विडंबना ये है कि शिक्षा और विज्ञान में तरक्की के बावजूद भी लोग अंधविश्वास की गिरफ्त से उबर नहीं पा रहे। साउंड ऑफ साइलेंस, पॉज़िटिव एनर्जी और पॉज़िटिव वाइब्रेशन तथा नारियल फोड़ने जैसी मान्यताओं को आज भी पढ़ा-लिखा समाज मान रहा है।
आज के पढ़े-लिखे वर्ग में भी अंधविश्वास इतना व्यापक क्यों है? अंधविश्वास का समूल समाधान क्या है? इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के समुचित उत्तर ही अंधकार की ओर बढ़ रही इस पूरी मानवता को बचा सकते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत ने इन तमाम झूठी और दुष्प्रचारित मान्यताओं का खंडन किया है और आत्मज्ञान संचालित वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित किया है।
क्लाइमेट चेंज:
आज के समय में क्लाइमेट चेंज मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। अत्यधिक बढ़ता तापमान, बिगड़ता वर्षा चक्र, अनियमित हवाएँ व तूफान, विलुप्त होती प्रजातियाँ, पिघलते ग्लेशियरों के कारण बढ़ता समुद्र जलस्तर - ये सब क्लाइमेट चेंज के कुछ प्रभाव है।
हम सिक्स्थ मास एक्स्टिंक्शन फ़ेज़ (छठे महाप्रलय) में प्रवेश कर चुके हैं। प्रजातियों की विलुप्ति दर आज साधारण दर से बढ़कर हज़ार गुना हो गई है। हम त्वरित गति से अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहे हैं और महत्वपूर्ण बात ये है कि इस विनाश का कारण भी हम खुद ही हैं।
वेदान्त कहता है — हमारे बाहर के सब कर्म हमारी भीतरी बेचैनी की अभिव्यक्ति होते हैं। हम नहीं जानते कि हम कौन हैं, हम यहाँ किसलिए हैं, हमारी वास्तविक ज़रूरत क्या है, इसलिए हम अन्तहीन भोग करते हैं, प्रजनन करते हैं और एक अर्थहीन जीवन जीते हैं।
लेकिन क्या ये भोग और भोग की वस्तुएँ हमारे मन के खालीपन को भर पा रही हैं? इतना भोग करने पर भी वो भीतरी बेचैनी घटने की बजाय और बढ़ती क्यों जा रही है?
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने समझाया है कि कैसे मन की बेचैनी और उसको मिटाने की अनंत अज्ञान भरी कोशिशों का ही परिणाम क्लाइमेट चेंज है। यह पुस्तक क्लाइमेट चेंज के अर्थ और खतरनाक प्रभावों के साथ उसके असल कारण को समझने और उस ज्ञान से उठे असली समाधान तक पहुँचने में किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत मददगार है।
हम उपभोगवादी युग में जी रहे है। जो कुछ भी दिख रहा है, वो हमारे लिए बस भोग की एक वस्तु है। वो इसलिए, क्योंकि 'अध्यात्म' को तो हमने कूड़ा-करकट समझकर के बिलकुल फेंक दिया है।
जब आप अध्यात्म को फेंक देते हो 'कूड़ा' जानकर, तो जीवन में ज़बरदस्त अपूर्णता आ जाती है। उसी अपूर्णता से फलित होता है माँसाहार।