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गीता भाष्य 2023 - भाग 4
अध्याय 3, श्लोक 17-31
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Book Details
Language
hindi
Description
श्रीमद्भगवद्गीता का तीसरा अध्याय हमें कर्मयोग के बारे में बताता है। आचार्य जी ने गीता के हर श्लोक को विस्तार से समझाया है। कर्मयोग के सत्रहवें श्लोक से लेकर इकतीसवें श्लोक में जो बोधपूर्ण चर्चा हुई है जिसमें आचार्य जी कहते हैं कि अपने पर ध्यान दो, वो ज़्यादा अच्छा तरीक़ा है दूसरे में बदलाव लाने का। हम बदलेंगे तो हम वो रोशनी बन जाएँगे जिसकी मदद से दूसरे भी अपना रास्ता देख पाएँ। कर्मयोग का व्यावहारिक जीवन में मतलब ये नहीं है कि जो करो वह कृष्ण को अर्पित कर दो, या जो करो वह कृष्ण को लक्ष्य करके करो। कर्मयोग का सीधा-सीधा, ज़मीनी और बिलकुल साफ़, सरल अर्थ है — जो कुछ भी कर रहे हो, ऊँचे-से-ऊँचे लक्ष्य के लिए करो। और हमारे लिए उच्चतम लक्ष्य वही है हमें उच्चतम समझ में आता हो क्योंकि हमारे पास और चारा नहीं है। यदि हमसे कहा जाए कि उच्चतम लक्ष्य है संसार में अध्यात्म को प्रतिष्ठापित करना तो वो उच्चतम लक्ष्य भी हमारे लिए बस बातचीत की चीज़ रह जाएगा क्योंकि हमें उसका कुछ पता ही नहीं, हम उसमें दखल ही नहीं दे पाएँगे। तो हमारे लिए ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य वही है जो हमारे सामने हो, जो हमारी निजी ज़िन्दगी में मौजूद हो।
Index
1. समस्या कमी नहीं, अधिकता है (श्लोक 3.17) 2. न कर्मानुष्ठान न कर्मत्याग (श्लोक 3.18) 3. किसको कहते हो अपना कर्तव्य? (श्लोक 3.19) 4. निष्काम कर्म की पहचान क्या? (श्लोक 3.20) 5. आत्मस्थ व्यक्ति किस दिशा चलता है? (श्लोक 3.21) 6. कर्तव्य नहीं, दुख-कर्तव्य का त्याग करो (श्लोक 3.22)
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