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गीता भाष्य 2023 (भाग 3)
अध्याय 3, श्लोक 1-16
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Book Details
Language
hindi
Description
अर्जुन विषाद में हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। मोह से ग्रसित अर्जुन भाँति-भाँति के तर्क देकर युद्ध न करने की अपनी कामना को व्यक्त करते हैं। चूँकि आत्म-अज्ञान अर्जुन की मूल समस्या है, इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मज्ञान की शिक्षा देते हैं। और बताते हैं कि तुम स्वयं को तन समझते हो इसलिए तन के सम्बन्धियों से मोह और अनुराग हो रहा है, और स्वयं को मन समझते हो इसलिए मन के संस्कारों के वशीभूत होकर युद्ध से पीछे हट रहे हो। श्रीकृष्ण अर्जुन को ज्ञान बताते हैं ताकि ज्ञान कर्म का स्रोत बन सके और अर्जुन सही कर्म में उतर सकें। पर मोह से आविष्ट अर्जुन कृष्ण की ही बात को अपनी कामना की ढाल बना लेना चाहते हैं। और इस तरह तीसरे अध्याय का आरम्भ होता है अर्जुन के इस प्रश्न से - “हे केशव, कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो मुझे क्यों घोर कर्म में नियुक्त कर रहे हो?” आगे श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हैं, बताते हैं कि ज्ञान अगर सच्चा हो तो वो अकर्मण्यता को कभी नहीं जन्म देगा। जैसे सूरज के दिल में अगर आग दहक रही है तो उसने दुनिया को प्रकाशित भी कर रखा है। वैसे ही आत्मज्ञान हो जाए और निष्काम कर्म न हो, ये सम्भव नहीं है। ज्ञानयोग और कर्मयोग अलग-अलग नहीं होते।
Index
1. ज्ञान और कर्म एक साथ चलते हैं (श्लोक 3.1-3.2) 2. कुछ न करना असम्भव (श्लोक 3.3-3.5) 3. जो अनासक्त हो सब कर्म करे वही श्रेष्ठ है (श्लोक 3.5-3.7) 4. नियत कर्म वो जो मुक्ति की ओर ले जाए (श्लोक 3.8) 5. ऐसा कर्म जो कभी बन्धन नहीं बनता (श्लोक 3.9) 6. सकाम कर्म के अनन्त फल!
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