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गीता भाष्य 2023 (भाग 1)
अध्याय 1 सार व अध्याय 2, श्लोक 53 तक
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Book Details
Language
hindi
Description
अर्जुन विषाद में हैं, अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। कल तक युद्ध को आतुर थे; रगें फड़कती थीं, खून खौलता था। अभी आज सुबह तक ही लगता था कि बस शंखनाद हो और अतीत की सारी विषमताओं की कालिख अपने बाणों की वर्षा से धो दें। ठीक तब जब अर्जुन बाण चढ़ाने वाले हैं, समय उनके सामने अतीत की स्मृतियाँ लाकर खड़ा कर देता है। अर्जुन के बाज़ू शिथिल पड़ जाते हैं और पाँव काँप जाते हैं, 'पितामह, आचार्य, बन्धु – इनके लिए तो जिया जाता है, इन्हें मारकर कौनसा जीवन मिलने वाला है!' नहीं लड़ेंगे अर्जुन। तय कर लिया है, बिलकुल नहीं लड़ेंगे। श्रीकृष्ण मोह, भ्रम, भय, शोक, इन सबको अलग-अलग चुनौती नहीं देते, न अर्जुन का कुछ क्षणिक उत्साहवर्धन करके ऊर्जा का संचार करते। कितनी रोचक और उत्कृष्ट बात है कि अर्जुन की ग्लानिगत अवस्था को काटने के लिए अर्जुन को तत्त्वज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण ने शुरुआत ही की है उच्चतम ज्ञान से, और विशेषता ये कि उन्होंने ज्ञान को कर्म के साथ जोड़ दिया है – भीतर आत्मज्ञान, तो बाहर निष्काम कर्म। पहले अध्याय में अर्जुन ने अपने सारे प्रश्न श्रीकृष्ण के सामने रखे हैं। दूसरे अध्याय से श्रीकृष्ण के अद्भुत गीत का प्रबल उद्घाटन होता है।
Index
1. अर्जुन की असल समस्या का उद्घाटन (श्लोक 1.19) 2. दुर्योधन की जीत में भी हार, अर्जुन की हार में भी जीत (श्लोक 2.2-2.11) 3. प्रकृति, अहम् वृत्ति और आत्मा का सम्बन्ध (श्लोक 2.11-2.14) 4. परिवर्तनों के मध्य आत्मामुखी रहे अहम् (श्लोक 2.15-2.23) 5. प्रकृति से विलगता ही प्रेम है (श्लोक 2.25-2.39) 6. निष्काम कर्म इतना मुश्किल क्यों? (श्लोक 2.39-2.44)
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