ताओ ते चिंग - भाग 1 + ताओ ते चिंग भाग - 2 + ताओ ते चिंग भाग - 3 + आत्मज्ञान + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
चार पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए चार पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! ताओ ते चिंग - भाग 1 + ताओ ते चिंग भाग - 2 + ताओ ते चिंग भाग - 3 + आत्मज्ञान + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
ताओ ते चिंग - भाग 1:
प्रस्तुत पुस्तक एक अनूठी पुस्तक है जो विश्व के प्राचीन ग्रंथों में से एक "ताओ ते चिंग" पर आचार्य प्रशांत के प्रवचनों को संकलित करती है। ताओवाद कोई आयोजित धर्म नहीं है, वो एक तरह की जीवन-पद्धति है। ताओवाद कहता है, ‘यदि जीवन में शुभता लानी है तो प्रकृति के पीछे क्या है, प्रकृति का आधार क्या है, उसको समझना पड़ेगा।’ वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय भी जिज्ञासा है, जानना है।
आचार्य प्रशांत ने इस पुस्तक के माध्यम से “ताओ ते चिंग” के रहस्यमयी सूत्रों को वेदान्त के प्रकाश में आज के संदर्भ में सरल और सहज भाषा में समझाया है, जिससे पाठक इस प्राचीन ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात कर सकें। यह पुस्तक ताओवाद की शिक्षाओं को वर्तमान जीवन की चुनौतियों और आवश्यकताओं के प्रति अत्यधिक प्रासंगिक बनाती है। इस पुस्तक में “ताओ ते चिंग” से पहले 10 सूत्रों पर व्याख्या को संकलित किया गया है।
ताओ ते चिंग भाग - 2:
दो सहस्राब्दियों से अधिक पुराना होने पर भी ताओ ते चिंग आज भी मनुष्य के जीवन को देखने की एक विरल दृष्टि देता है। इसकी विशेषता यह है कि यह बात को सीधे उपदेश की तरह नहीं, बल्कि ऐसे सूत्रों में कहता है जो हमारी जमी हुई धारणाओं को हिला देते हैं। कहीं खालीपन को शक्ति कहा गया है, कहीं पीछे रहने को श्रेष्ठता, और कहीं जल की तरह सरल, विनम्र और जीवनदायी होने की बात की गई है। यह ग्रंथ मनुष्य को अधिक सहज, अधिक सरल और कम बोझ लेकर जीने की दिशा देता है।
प्रस्तुत पुस्तक आचार्य प्रशांत द्वारा ताओ ते चिंग की व्याख्या पर आधारित शृंखला की दूसरी कड़ी है, जिसमें अध्याय चार से आठ तक के सूत्र संकलित हैं। पुस्तक में आचार्य प्रशांत द्वारा की गई व्याख्या इन गूढ़ सूत्रों को आज के संदर्भ में जीवंत कर देती है। इन व्याख्याओं का केंद्रीय सूत्र है: हम जिन संबंधों, सफलता, मान-सम्मान, अपनी मान्यताओं और सुरक्षा के सहारे स्वयं को पूरा करना चाहते हैं, उन्हीं से बँध भी जाते हैं।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो जीवन को भय, चिपकाव और सहारे की आदत से नहीं, बल्कि अधिक स्पष्टता, सरलता और आंतरिक बल के साथ जीना चाहते हैं। जो ताकत जोड़ते जाने से नहीं, बल्कि अनावश्यक बोझ छोड़ने से आती है, उसी की ओर यह पुस्तक एक शांत पर गहरा संकेत करती है।
ताओ ते चिंग भाग - 3:
ताओ ते चिंग विश्व की उन विरल कृतियों में है जिनकी संक्षिप्त पंक्तियाँ जीवन के अत्यंत गहरे आयामों को स्पर्श करती हैं। लाओ त्सु के ये सूत्र मनुष्य को बाहरी जटिलताओं से हटाकर सूक्ष्म बोध की ओर ले जाते हैं। यह ऐसा ग्रंथ है जो जीवन में कुछ और जोड़ने की बेचैनी को नहीं बढ़ाता, बल्कि यह देखने की दृष्टि देता है कि सार्थक क्या है और व्यर्थ क्या।
आचार्य प्रशांत की ताओ ते चिंग पर की गई व्याख्याओं पर आधारित पुस्तकमाला का यह तृतीय भाग है, जिसमें ग्रंथ के अध्याय नौ से चौदह तक की व्याख्या को संकलित किया गया है। यह व्याख्या इस प्राचीन और बहुमूल्य ग्रंथ को आज के मनुष्य के लिए जीवित, निकट और निर्णायक रूप से प्रासंगिक बना देती है। यह पुस्तक ताओ ते चिंग के सूत्रों का मर्म खोलती है, और उन्हें केवल पढ़ने या उद्धृत करने की वस्तु नहीं रहने देती, बल्कि पाठक के अपने जीवन से सीधा जोड़ देती है। पुस्तक में अध्याय 9 से 14 की व्याख्या मन, संबंध, कर्म, नेतृत्व, अनुभव, भय, सफलता और ध्यान जैसे जीवन के मूल पक्षों पर पाठक को गहरी स्पष्टता प्रदान करती है।
आत्मज्ञान:
क्या है आत्मज्ञान?
आत्म माने 'मैं'। हम जीते जाते हैं, कर्म करते जाते हैं बिना कर्म की पूरी प्रक्रिया को ग़ौर से देखे। कर्म कहाँ से हो रहे हैं, कर्मों के पीछे क्या है, कर्मों का कर्ता कौन है, इस पर ग़ौर करने की हम न ज़रूरत समझते हैं न हमें अवकाश मिलता है, क्योंकि कर्मों की एक अविरल श्रृंखला है।
आत्मज्ञान का मतलब हुआ कि आपको साफ़ पता हो कि कर्म के पीछे कौन है। आत्मज्ञान का मतलब होता है ठीक तब जब जीवन की गति चल रही है, आप उसके प्रति जागरूक हो जाएँ। और तब आप बिना उस गति को रोके भी उस गति से बाहर हो सकते हैं।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने इस तथ्य पर रोशनी डाली है कि आत्मज्ञान का मतलब यह नहीं होता कि तुम आत्मा को जान गये, आत्मा के ज्ञान को आत्मज्ञान नहीं कहते। आत्मज्ञान का मतलब है अहंकार का ज्ञान। आत्मा का ज्ञान नहीं होता, आत्मा की अनुकम्पा से आत्मज्ञान होता है।
आत्मज्ञान आपको बताता है कि आप वृत्तियों के, गुण-दोषों के, अहंकार के पुतले मात्र हो। तो फिर अपने लिए कोई कामना करना व्यर्थ हो जाता है, तब आप निष्काम हो पाते हो। तो आत्मज्ञान से ही फिर निष्काम कर्म भी फलित होता है।