वासना और डर: एक ही जड़

Acharya Prashant

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वासना और डर: एक ही जड़
अगर आपको ये भी डर लग रहा है कि अज्ञात भविष्य में क्या होगा, तो आपने उस अज्ञात भविष्य के ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ थोपी हैं, इसलिए आपको डर लग रहा है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: सर, इंग्लिश में या हिंदी में?

आचार्य प्रशांत: किताब अंग्रेज़ी में है, आप जैसे बोलना चाहें, बोलिए।

प्रश्नकर्ता: *माय क्वेश्चन इज़ फ्रॉम चैप्टर 20 — “फियर इज़न्ट अ वीकनेस, इट्स अ मैसेज।”

जैसे, पिछले कुछ वर्षों में मुझे आपसे बहुत ताकत मिली है और मैंने कई डर को पार कर लिया है, जो मैं कुछ साल पहले नहीं कर पाया था, ये ऐसा है। लेकिन कई बार, जैसे ज़्यादातर अकेले, जहाँ मैं वास्तव में गहराई में चला जाता हूँ, जहाँ ये बहुत जटिल हो जाता है, जहाँ मैं संदेश को नहीं समझ पाता हूँ, जो मुझे वहाँ से मिल रहा है। मैं इसे देखने की कोशिश करता हूँ, ये क्या कहने की कोशिश कर रहा है? लेकिन मुझे ये स्पष्ट रूप से समझ नहीं आता, जैसे मैं बिना वजह इतना उदास क्यों हो रहा हूँ? ऐसे समय में क्या करना चाहिए?

आचार्य प्रशांत: नहीं, भीतर जो भी कुछ हो रहा है न, वो कॉज़ैलिटी से बँधा हुआ है, उसमें कार्य-कारण लगा हुआ है। केमिकल रिएक्शन की तरह है, जिसमें कुछ शर्तें होती हैं, वो शर्तें पूरी हो रही हैं तभी वो रिएक्शन हो रहा है। उसमें रिऐक्टेंट्स चाहिए, उसमें टेम्प्रेचर-प्रेशर सब चाहिए, उसमें कैटेलिस्ट हो सकता है चाहिए हो, उसमें टाइम हो सकता है चाहिए हो, वो सब मिल रहा है तभी हो रहा है।

तो आपके भीतर रिएक्शन हो रहा है, उससे कोई प्रॉडक्ट हो रहा है, प्रॉडक्ट का नाम है फियर। आपके भीतर भी एक रिएक्शन है, जिसका प्रॉडक्ट है, उसका नाम है फियर। हम सब जानते हैं फियर केमिकल चीज़ है। हम जानते हैं न, फियर केमिकल होते हैं भीतर, और हमें उनके एंटीडोट्स भी पता हैं। वो आपको लगा दिए जाएँ तो आपका डर बिल्कुल कम हो जाता है।

दुनिया भर में जो स्पेशल फ़ोर्सेज़ वग़ैरह होती हैं, उनमें इसका इस्तेमाल होता है। जब उनको भेजा जाता है ख़ास स्पेशल मिशन्स पर, तो उनको ऐसी चीज़ें दे दी जाती हैं कई बार, जिससे उनको डर लगना ही बंद हो जाता है। पुराने समय में भी होता था, जब सैनिक जा रहे होते थे तो कई बार उनको ख़ुराक के साथ-साथ गाँजा, अफ़ीम वग़ैरह भी दे दिया जाता था। क्यों दिया जाता था? इससे इनको पहली बात डर कम लगेगा, दूसरा जब घाव होगा तो दर्द कम होगा।

तो ये केमिकल चीज़ है, डर वग़ैरह ये पूरी तरह केमिकल चीज़ है। और आप अगर गूगल करोगे, तो आपको उस केमिकल के नाम भी मिल जाएँगे कि फियर केमिकल क्या होता है। उसका आपको मिल जाएगा, ये केमिकल है, ये फ़ॉर्मूला है।

तो हर केमिकल के पीछे रिऐक्टेंट्स होंगे और कई शर्तें होंगी। आप अपने आप से पूछ लीजिए कि कौन-कौन सी चीज़ें मिली हैं, तब जाकर ये फियर वाला एंड प्रॉडक्ट तैयार हुआ है। एक-एक करके जाँच लीजिए, अगर ये नहीं होता तो क्या मैं डरता? ये नहीं होता तो क्या डरता? ये नहीं होता तो क्या डरता? उससे पता चल जाएगा।

उसमें कुछ मिस्टिकल नहीं होता है। आपके साथ जो कुछ हो रहा है न, वो सब मटेरियल है। उसमें कुछ ऐसा नहीं है कि मुझे अज्ञात का डर लग रहा है। अज्ञात माने, जो पता ही नहीं, उसका डर नहीं लग सकता। अज्ञात का कोई रिएक्शन होगा क्या? कभी सुना है कि ऐन अननोन केमिकल रिऐक्टेड? अब अननोन है तो क्या रिएक्शन करेगा, भाई? डर हमेशा नोन चीज़ों से ही होता है।

अगर आपको ये भी डर लग रहा है कि अज्ञात भविष्य में क्या होगा, तो आपने उस अज्ञात भविष्य के ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ थोपी हैं, इसलिए आपको डर लग रहा है।

अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा?

अज्ञात माने जिसका कुछ पता नहीं। जिसका कुछ पता नहीं, वो डरा भी कैसे सकता है? पर अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। तो इसलिए डर लग रहा है। ये होता है आत्मवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से, किस केमिस्ट्री से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, बहुत मज़ा आता है। आज़ाद हो जाते हो, कि अच्छा, ये हुआ है।

कंडीशन्स को थॉट एक्सपेरिमेंट में बदल लिया करो, “अच्छा, इसकी जगह अगर ऐसा होता तो क्या मैं डरता? अगर इसकी जगह ऐसा होता, क्या मैं तो भी डरता?” ये सब अपने आप से पूछ लिया करो। जब केमिस्ट्री ही है, तो उसको ऑल्टर करना कौन-सी बड़ी मुश्किल बात हो गई? कर दो।

प्रश्नकर्ता: “गुड ईवनिंग, सर। सर, देयर इज़ वन चैप्टर, सेक्स इज़न्ट द प्रॉब्लम, एम्प्टिनेस इज़ — विच सेज़, ग्रेट सेक्सुअल अर्ज इज़ ऐन इंडिकेटर ऑफ ग्रेट इनर एनर्जी वेटिंग टू फाइंड द राइट डायरेक्शन। गिव इट द राइट डायरेक्शन। सो, हाउ टू गिव इट द राइट डायरेक्शन — दिस इनर एनर्जी? आई ऐम फेलिंग इन दैट।

आचार्य प्रशांत: बेटा, जिनके पास कुछ करने को नहीं है, वो कुछ तो करने की कल्पना करेंगे न, या अरमान जगाएँगे। आप यहाँ बैठे हो, आप सेक्स पर सवाल कर रहे हो। यहाँ मान लीजिए जो हवसी से हवसी आदमी भी मौजूद हो, वो इस वक़्त तो सेक्स की नहीं सोच रहा होगा, या सोच रहा होगा? क्योंकि एम्प्टीनेस नहीं है न अभी। अभी एक उद्देश्य मिला हुआ है, भले ही वो उद्देश्य इस माहौल की पैदाइश हो, भले ही वो उद्देश्य क्षणिक हो। कि ये माहौल बीतेगा और उसके बाद आप पाओगे कि आप फिर रूखे रह गए, या अकेले रह गए, या अभी तक फिर सूनापन खड़ा हो गया है। अब

आदमी को पता नहीं होता कि वो सूनापन चीज़ क्या है, वो पैदा कहाँ से हो रहा है। तो उसको भरने के लिए फिर तरह-तरह की कोशिशें करता है अपनी स्थिति अनुसार।

बच्चा छोटा होता है, तो उसकी स्थिति ये होती है कि वो अपने सूनेपन के लिए खिलौनों का इस्तेमाल करेगा। तो बच्चा सेक्स की नहीं सोचेगा, हालाँकि वही सूनापन उसको भी सता रहा है। पर उसकी स्थिति बच्चे जैसी है, तो वो कहेगा कि मुझे टॉय दे दो। बच्चा छोटा है, उसकी स्थिति सेक्सुअल नहीं है, तो कहेगा, मुझे टॉय दे दो। पर इस आग्रह के केंद्र में है सूनापन ही।

आप बड़े हो जाओगे, आपको भी अभी वही सूनापन सता रहा है जो छोटे बच्चे को सताता था। और उससे भी छोटा जो नवजात था, जो चिल्लाता था माँ के लिए, उसको भी वही सूनापन सता रहा था। तो नवजात है, फिर बच्चा है, अब आप बड़े हो गए हो। वही सूनापन है, अस्तित्वगत। ठीक है? ऑन्टोलॉजिकल वॉइड कहते हैं उसको। वही है अभी भी। पर आपकी स्थिति बदल गई है, तो अब आप टॉय नहीं, आप सेक्स टॉय माँगोगे।

फिर आप थोड़े बूढ़े हो जाओगे, आपकी फिर स्थिति बदल जाएगी शारीरिक, जो बायोकेमिस्ट्री है, वो बदल गई। अब आप फिर एक अर्थ में बच्चे जैसे हो गए, कि सेक्स अब आपकी शारीरिक क्षमता से बाहर का हो गया। तो अब आप कुछ और माँगोगे। अब आप कहोगे, मुझे इज़्ज़त चाहिए, या मुझे बहुत सारा पैसा चाहिए, है न? या मुझे कुछ स्वर्ग वग़ैरह का भरोसा दे दो। बात समझ में आ रही है? लेकिन सूनापन वही है, जो नवजात को भी था, जब वो चिल्ला के रोया था। पैदा हुआ था रोया था न, वो भी एक सूनेपन से रोया था। वही सूनापन, आपकी बदलती स्थितियों के अनुसार, अलग-अलग चीज़ों की डिमांड करता है।

वो निर्भर इस पर करता है कि आप क्या हो। आप स्त्री हो, तो वो डिमांड पुरुष की करेगा। आप पुरुष हो, तो स्त्री की करेगा। आप ग़रीब हो, तो पैसे की करेगा। आप अमीर हो, तो प्रसिद्धि की करेगा। आप हिन्दुस्तानी हो, तो वो अमेरिका की डिमांड करेगा। आप अमेरिका के हो, तो मार्स की डिमांड करेगा। आप मंत्री हो, तो मुख्यमंत्री बनने की डिमांड करेगा। समझ में आ रही है बात? और वो सूनापन जब तक रहेगा, आपकी स्थिति जो भी है, उसी के अनुसार आप डिमांड करते ही जाओगे। ऐसा लगेगा कि अलग-अलग चीज़ों की डिमांड हो रही है। पर वो जो आपकी डिमांड है, माने डिज़ायर है, वो वास्तव में आ रही है एक ही जगह से।

अब ये है कि छोटा बच्चा है, तो वो सेक्स नहीं माँग सकता। छोटा बच्चा है, तो सेक्स नहीं माँगेगा। और बूढ़ा आदमी है, तो छोटे बच्चे की तरह दूध नहीं माँगेगा। तो आपको ऐसा लगेगा कि डिज़ायर्स बदल रही हैं। नहीं, डिज़ायर्स तो बदल क्या रही हैं, सूनापन यथावत है, वैसे का वैसा ही है। बस जो जीव है वो एक लाइफ़ सायकल पर है, तो अपनी लाइफ़ सायकल के हिसाब से जो सूनापन है, वो अलग-अलग तरीके से अभिव्यक्त हो रहा है। वो सूनेपन की अभिव्यक्ति बदल रही है।

सूनापन वैसा ही है, जैसा वो पहली उसकी जो पुकार थी पैदा होने के बाद, जिसमें सबने ताली बजाई थी कि “पैदा हो गया, पैदा हो गया!” समझ रहे हो? फिर वो और जब बूढ़ऊ हो जाएगा तो कहेगा कि अब मुझे कुछ और चाहिए। मर रहा होगा तो भी कुछ कहता है कि “ले आओ, मुँह में गंगाजल डाल दो।”

अब ये जो गंगाजल माँग रहा है मरने से ठीक पहले, और वो जो दूध माँग रहा था पैदा होने के ठीक बाद, ये दोनों एक ही चीज़ माँग रहे हैं, क्योंकि दोनों की माँग एक ही केंद्र से आ रही है। उस केंद्र का नाम है सूनापन। और वो सूनापन और कुछ नहीं है, वही है हमारा अस्तित्वगत अज्ञान, उसी को अहंकार बोलते हैं। और वो सूनापन ग़ैर-ज़रूरी है, क्योंकि अहंकार मिथ्या है। लेकिन ये ग़ैर-ज़रूरी है, ये सिर्फ़ घोषणा करने से नहीं हो जाएगा। उसको जानना पड़ेगा, उसके पास जाकर, पूछना पड़ेगा कि “भाई, तुझे चाहिए क्या?”

अभी थोड़ी देर पहले तू वहाँ से गुज़र रहा था, वो ठेले वाले ने टिक्की बजाई, टन टन टन टन टन, तो तू बोलता है “भैया, एक पत्ता दे दो।” फिर वहाँ से आगे बढ़ता है, तो कोई दिख गई तो उससे बोल रहा है कि “तू अब कुछ दे दे।” अब सेक्स चाहिए तुझको। फिर वहाँ से आगे बढ़ा, तो कोई दिख गया बड़ी गाड़ी में, तो लग रहा है कि गाड़ी मिल जाए। फिर कुछ और दिख गया, तो लग रहा है ये मिल जाए।

तू हर समय कुछ न कुछ माँग ही रहा है, भिखारी! तेरी प्रॉब्लम सेक्स है ही नहीं। तेरी फ़ंडामेंटल प्रॉब्लम सेक्स नहीं है, क्योंकि कुछ साल बीतने के बाद तू शायद इतना सेक्सुअली एक्टिव न रह जाए, वो भी बायोकेमिस्ट्री है। कुछ साल बीतेंगे, तेरा कर्व ऐसे ढलान पर आ जाएगा। लेकिन तेरी डिज़ायर्स थमेंगी नहीं। बस इतना होगा कि तब तू सेक्स नहीं माँगेगा, कुछ और माँगना शुरू कर देगा। इसलिए वहाँ पर है कि सेक्स इज़न्ट द प्रॉब्लम, एम्प्टिनेस इज़।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जो माला जप करते हैं या मंदिरों के दर्शन के लिए जाते हैं, तो वो भी क्या हम अपने सूनेपन को भरने के लिए ही हो रहा है?

आचार्य प्रशांत: आप प्रौढ़ा हैं, आप सम्माननीय सामाजिक महिला हैं, तो आप ये बात कहेंगी तो लोग कहेंगे, “अच्छा, ठीक है, एक साधारण धार्मिक जिज्ञासा थी।” और सिर्फ़ यही बात मैं कहता हूँ, तो देखिए, आपका समाज कितना उग्र होकर विरोध करता है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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