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परिवार और ज़िम्मेदारियाँ आड़े आते हों तो || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि परिवार और कर्तव्यों के कारण मैं सत्य की तरफ़ एक मन से नहीं बढ़ पा रही। कृपया इस बात का झूठ देखने में मेरी मदद करिए।

आचार्य प्रशांत: ये लड़का (सामने बैठा श्रोता) एक सौ बीस किलो का है, यही उत्तर है मेरा। इस सूत्र से जो समझना है समझ जाओ।

अगर ये आश्रम आएगा तो क्या लेकर के आएगा? पूरे एक सौ बीस किलो। जिसके ऊपर जो बोझ लग गया वो बोझ लिये-लिये उसे आगे बढ़ना है न। मैं मान भी लूँ कि परिवार और कर्तव्य तुम्हारे ऊपर एक बोझ की तरह हैं, तो तुम्हें वो बोझ लिये-लिये ही तो आगे बढ़ना है।

आज इसको (एक श्रोता की ओर इशारा करते हुए) बोला मैंने, मैंने कहा तू जिम (व्यायामशाला) जाया कर और खेला कर। अब ये जिम जा रहा है। काहे के लिए जाएगा जिम ? वज़न कम करने के लिए। वज़न कम करने के लिए भी जाएगा तो कितना वज़न लेकर जाएगा?

श्रोता: पूरे एक सौ बीस किलो।

आचार्य: या बीस-चालीस किलो (स्वयं का) माँस घर पर छोड़कर जाएगा? ‘लो दिव्या ये तुम तब तक फ्रीज़र में रखो। फिर लौटकर आऊँगा तो धारण कर लूँगा। भाई! उतना लेकर के ट्रेडमिल पर दौड़ना मुश्किल पड़ेगा।'

जैसे हो वैसे ही आगे बढ़ोगे न? जो जहाँ है उसे वैसे ही तो आगे बढ़ना है, यही तो खेल है, यही मज़ा है, यही चुनौती है। जिसके आँख नहीं है वो बिना आँख के आगे बढ़े, जिसके एक पाँव नहीं वो बिना पाँव के आगे बढ़े। जिसके दो पाँव नहीं, वो दोनों पाँव के बिना आगे बढ़े और जिसके ऊपर बहुत सारा वज़न हो वो उस सबके साथ आगे बढ़े। उसके अलावा कोई भी कल्पना करना या चाहत करना अव्यावहारिक है। तुम्हारी चाहत कैसे पूरी होगी?

अब जुड़ तो गई हो न? वो तो यथार्थ हो गया तुम्हारा, ठीक वैसे ही जैसे वज़न यथार्थ होता है। और वज़न तो फिर भी आदमी घटा ले, मातृत्व का रिश्ता तो घटाए नहीं घटता। अपने तन से निकला है, अपने तन से दूर हो गया है, लेकिन माँओं का तो ऐसा है कि ऐसा लगता है मेरे तन का ही हिस्सा है वो। तो अब ये पूछना कि ये मेरे रास्ते की बाधा है, इसके प्रति कर्तव्य है, ज़िम्मेदारी है इत्यादि-इत्यादि है, यह अव्यवहारिक सवाल है, ये बेकार की बात है।

जो है, जैसा है मामला, जो भी ज़िम्मेदारियाँ हैं, कंधे पर जो कुछ भी बैठा रखा है, सिर पर जो कुछ भी बैठा रखा है, छाती से जो कुछ भी लगा रखा है उसको लिये-लिये आगे बढ़ो। यही धर्म है। और अब इसी में तुम्हारी सृजनात्मकता को चुनौती है कि कैसे इन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ना है।

देखो तो दोनों ही विकल्प बंद हैं तुम्हारे लिए। न तो तुम यह कह सकती हो कि कर्तव्य बहुत हैं तो आगे नहीं बढ़ूँगी। आगे तो बढ़ना पड़ेगा, नहीं तो कर्तव्यों में ही घिरी रह जाओगी, और कर्तव्यों में घिरे रह जाना बहुत बड़ी सज़ा है। और न तुम यह कह सकती हो कि मुझे आगे बढ़ना है तो अपने कर्तव्यों से मुँह चुरा लूँगी। क्योंकि प्रारब्ध को कोई छोड़ नहीं सकता, कर्मफल से कोई पीछा नहीं छुड़ा सकता।

जिस चीज़ को आज तुम कह रही हो कि मेरे ऊपर कर्तव्य की तरह है, वो यूँही नहीं आ गयी है, उसको तुमने आमंत्रित किया था। उसको योजना बना-बना कर बुलाया था। वो मेहमान है तुम्हारा। मेहमान को पहले तो बुलाओ, आमंत्रण पत्र भेजो और फिर जब आ जाए तो कहो, ‘यह तो...! कहाँ से आ गया!’ बुलाया किसने था? उसने ख़ुद आवेदन भेजा था कि मुझे आना है? तब तो परिवार बड़ा करने के लिए ऐसी-ऐसी योजनाएँ बनायी जाती हैं कि पूछो मत।

कोशिश पर कोशिश चल रही है, जुगाड़ पर जुगाड़। और फिर कहते हो कि यह तो फँस गए। फँस नहीं गए, अब वो कर्मफल है, प्रारब्ध। उसके साथ आगे बढ़ना है। उसी में सौंदर्य है, वही धर्म है, और उससे कोई छुटकारा नहीं है। अगर सिर्फ़ कर्तव्यों की पूर्ति करते रह गए तो कर्तव्य भी ठीक से पूरे नहीं कर पाओगे। और अगर प्रारब्ध को काट कर सत्य की ओर बढ़ने की कोशिश की तो तुम्हारी कोई गति नहीं बनेगी। क्योंकि आकर्षण और आसक्ति तो तुम्हें हैं ही, ऊपर-ऊपर से काट दोगी, भीतर-ही-भीतर जुड़ी रहोगी। जिधर को बढ़ना है उधर की ओर मुँह ही नहीं कर पाओगी। कदम सत्य की ओर बढ़ेंगे, मुँह मोड़कर पीछे की ओर देखोगी, कि जिगर के टुकड़े को तो पीछे छोड़ रखा है।

तो तुम्हारे लिए आगे बढ़ने का एक ही तरीक़ा है — जिसको छाती से लगा रखा है, उसको लगाये रखो। उसको लगाये-लगाये तुम दौड़ लगाओ। इसी में उसका भी भला है। इसी में रिश्ते का भी गौरव है, मर्यादा है। इसी में मातृत्व धर्म का निर्वाह भी है। और तुम्हारी गृहस्थी की, और रिश्तों की और भी जो ज़िम्मेदारियाँ होंगी, उनके बारे में भी यही बात लागू होती है।

मातृत्व को मैंने ख़ास तौर पर महत्त्व इसलिए दिया क्योंकि जीवन के जिस मक़ाम पर हो उसपर तुम्हारा जो अभी सबसे प्रमुख कर्तव्य है, वो मातृत्व से सम्बन्धित है। भई, हम ये कल्पना थोड़े ही कर सकते हैं कि अगर मैं कुछ और होता तो मैं सच्चा जीवन जीता। यह कैसी कल्पना है? तुम जो हो वो तुम हो, उस यथार्थ से मुँह चुरा नहीं सकते। यह कहना कि अगर मेरी परिस्थितियाँ दूसरी होतीं तो फिर मैं बिल्कुल आज़ाद और आध्यात्मिक जीवन जीती, यह आत्मप्रवंचना है। ये हम अपनेआप को बुद्धू बना रहे हैं।

तुम्हारी परिस्थितियाँ तो वही हैं जो हैं। तुम्हारी क्या परिस्थितियाँ हैं? जो हैं। अब उन्हीं के साथ तुम्हें सत्य की पुकार का जवाब देना है। बात ठीक है न? या ऐसा कहते हो कि अगर मेरे ऊपर वायरस (विषाणु) न लगे होते तो मैं ज़रा सुविधा से और आसानी से चिकित्सक के पास पहुँच जाता? तुम इंतज़ार करोगे कि जब सारे वायरस हट जाएँ तो तुम पहुँचोगे चिकित्सक के पास, सुविधा से, आसानी से? नहीं।

अभी तुम्हें विषाणु लगा हुआ है, शायद तुम्हारी टाँगों में दर्द हो रहा होगा, तुम्हें चलने में तकलीफ़ है। पर तुम्हें तकलीफ़ के बावजूद और वायरस के साथ चिकित्सक तक पहुँचना है। तुम इंतज़ार थोड़े ही करोगे कि जब स्थितियाँ बिलकुल अनुकूल हो जाएँ तब जाएँगे। स्थितियाँ अनुकूल हो ही गयीं तो जाकर क्या करोगे?

जैसे हो, जहाँ हो, आगे बढ़ो। आधे हो, आगे बढ़ो। पूरे हो, आगे बढ़ो। स्त्री हो, आगे बढ़ो। माँ हो, आगे बढ़ो। पुरुष हो, आगे बढ़ो। शराबी हो, आगे बढ़ो। उसके दरबार में सब आमंत्रित हैं। इंतज़ार मत करना। हरे हो, नीले हो, पीले हो, सब आगे बढ़ो। ज्ञानी हो, अज्ञानी हो, सब आगे बढ़ो। पढ़े हो, अनपढ़ हो, आगे बढ़ो। जवान हो, बूढ़े हो, आगे बढ़ो। सच्चे हो, आगे बढ़ो। झूठे हो, आगे बढ़ो। कर्तव्य निभाते हो, आगे बढ़ो। सौ दफ़े तुमने कर्तव्यों के साथ धोखाधड़ी की है, तो भी आगे ही बढ़ो।

आगे बढ़ने की बहुत प्यास है, बेशक आगे बढ़ो। आगे बढ़ने की कोई प्यास नहीं है, बेटा, तुम भी आगे ही बढ़ो। कोई विकल्प ही नहीं है और। जहाँ हो, जैसे हो, बढ़ो। बाज़ार में हो, आगे बढ़ो। रेगिस्तान में हो, आगे बढ़ो। स्वस्थ हो, आगे बढ़ो। बीमार हो, आगे बढ़ो।

प्रतिपल और प्रत्येक स्थिति में बढ़ते रहना है उसी की ओर, यही जीव का धर्म है। स्थितियाँ बदलती रहें, निष्ठा न बदले। और स्थितियाँ तो बदलती रहेंगी, आज जैसे हो वैसे कल नहीं रहोगे, तो!

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। आपने सूत्र दिया है कि अगर दूर तक दिखाई न दे रहा हो तो वहाँ तक चलो जहाँ तक दिखाई दे रहा है। जितना भी समझा है उसपर अमल करो। इससे मुझे समझ या सवाल का एहसास नहीं हुआ। इसमें मुझे एहसास हुआ, जहाँ हो वहीं रहने का। अगर यहीं हूँ तो जो भी कुछ कर रहा हूँ उसपर अमल है। बस कभी-कभी डर लगता है एकदम से सब कुछ भूल न जाऊँ। सवाल अभी भी हैं, अड़चनें अभी भी हैं, पर वैसी नहीं हैं जैसी पहले थीं। कृपया मुझे बताइए कि अब मैं कुछ और कैसे पूछूँ।

आचार्य: जहाँ खड़े हो वहाँ सवाल नहीं मिलेंगे। जब आगे बढ़ो तो सवाल मिलेंगे। जो सूत्र तुमने उद्धृत करा है मेरे द्वारा दिया हुआ, यही कह रहा है न कि अगर दूर तक दिखाई न देता हो तो जहाँ तक दिखाई देता हो वहाँ तक बढ़ो। वहाँ तक बढ़ो तो जगह नयी होगी। वहाँ तक बढ़ो तो नज़ारा नया होगा। जब जगह नयी होगी, नज़ारा नया होगा तो फिर सवाल भी नए होंगे। जहाँ खड़े हो वहाँ खड़े ही रहोगे तो सवाल कहाँ से आने वाले हैं?

तुम तो बड़ी ज्ञात जगह पर खड़े हो, वहाँ सवाल होते ही नहीं। जो होते भी हैं उनका निपटारा हो चुका है। अब तो वही करो जो कहा है कि आगे बढ़ो। आगे बढ़ोगे, वहाँ कुछ अड़चनें आएँगी, वहाँ कुछ दुविधा, द्वन्द्व सामने आएगा, तब पूछना तो बताऊँगा।

वास्तव में असली प्रश्न भी उन्हीं के पास होते हैं जो असली जीवन जी रहे हों। जो असली लड़ाई लड़ रहा होगा वही तो असली घाव लेकर आएगा न? तो फिर गुरु उसकी ज़रा मरहम-पट्टी करेगा। जो लड़ ही नहीं रहा वो गुरु के पास घाव भी कैसे लेकर आएगा? वो घर पर बैठे हैं और आ गए हैं, कह रहे हैं, ‘सबकी मरहम-पट्टी हो रही है, हमारी भी हो।' भई, तूने किया क्या है जो तेरी मरहम-पट्टी हो? आ तुझे मरहम-पट्टी चाहिए तो पहले घाव देता हूँ।

पट्टी का बहुत शौक़ है तो पहले आओ, तुझे घाव दिये जाएँगे। आगे बढ़ो और लड़ो। किसके ख़िलाफ़ लड़ना है? उसके ख़िलाफ़ जो तुम्हें आगे बढ़ने से रोकेगा। वो कुछ तुम्हारे भीतर है, कुछ तुम्हारे बाहर है, वो दोनों तरफ़ से तुम्हें रोकेगा। और उससे लड़ोगे तो चोट बहुत पहुँचाएगा। कुछ चोट बाहर से पहुँचाएगा, ज़्यादा बड़ी चोट भीतर से पहुँचाएगा। फिर जब लहू चूने लगे तो आना मेरे पास। फिर सवाल करोगे कि यह सब जो कष्ट हो रहा है, दर्द हो रहा है, खून चू रहा है, इसको कैसे रोकें? फिर मैं बताऊँगा।

अभी तुम्हारे पास सवाल नहीं है तो इसीलिए नहीं हैं कि जहाँ खड़े हो वहीं खड़े हो। आगे तो बढ़ो, हिलो तो। आगे बढ़ने का क्या अर्थ है? जहाँ खड़े हो, जानो कि वहाँ क्या ठीक नहीं है, तो उसको छोड़ो। और जो ठीक है, उसके प्रेम में उससे मिलने के लिए, उसे पाने के लिए आगे को लपको, यही है यात्रा।

एक स्थान को छोड़ना, और दूसरे स्थान के लिए लालायित हो जाना, इसी को तो यात्रा कहते हैं न? जो कुछ सड़ा-गला, कूड़ा-कचड़ा हो उसको छोड़ो। छोड़ोगे तो कष्ट होगा, फिर सवाल उठेंगे, पूछोगे। और जो प्रेम का पात्र है, प्रेम का भागी है, उसकी ओर बढ़ोगे तो राह में काँटें मिलेंगे, दुश्वारियाँ होंगी, तब भी सवाल उठेंगे, तो पूछोगे।

प्र३: आचार्य जी, ऐसा कुछ भी नहीं जो आपने बोला नहीं। सिर्फ़ करुणा है आपकी जो बार-बार वही बोलते हैं। और यह मन है जो चाह कर भी करना नहीं चाहता। खेल न समझ आ रहा है, न खेलना जानती हूँ। सवाल कुछ भी उठे तो तुरंत हँसी और आती है।

आचार्य: हँसे जाओ, और क्या बताऊँ! तुम तुमसे मजबूर, मैं अपनेआप से मजबूर। मेरी मजबूरी है कि मैं बोले जाऊँगा। तुम्हारी मजबूरी है कि तुम कभी सुनोगे, कभी नहीं सुनोगे, कभी चलोगे, कभी नहीं चलोगे। न हममें कोई ऊँचा न कोई नीचा।

तुम वही कर रही हो जो तुम्हें सदियों-शताब्दियों से करना था। और मैं भी वही कर रहा हूँ जो मैं सदियों-शताब्दियों से किये आ रहा हूँ। दोनों अपना-अपना किरदार निभा रहे हैं। चलने दो जैसा चल रहा है।

कह रही हो, ‘खेल न समझ आता है न खेलना जानती हूँ,' खेल यही है। पूरा जो ये जगत है, और थोड़े ही कुछ है, गुरु और शिष्य का खेल है। सत्य गुरु है, चेतना चेला है, इन दोनों के अलावा और कुछ होता नहीं। इन्हीं का खेल चल रहा है। और उस खेल में पूरी तरह तो सहभागी हो। क्या कहती हो कि खेल न समझ आ रहा है न खेलना जानती हूँ! अपने तरीक़े से खेल रही हो, पर खेल तो रही ही हो। और इसमें कोई नियम नहीं बँधे हुए हैं, सब अपने-अपने तरीक़े से खेलते हैं।

मैं बोलता हूँ, कोई कुछ सुनता है, कोई कुछ सुनता है। कोई मेरे निकट आता है, कोई दूर जाता है। मुझसे दूर जाकर कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है। सब अपने-अपने तरीक़े से खेल रहे हैं। जैसे सूरज हो और नौ ग्रह हों, और सब अपनी-अपनी कक्षा में चक्कर काट रहे हों। सब अपने-अपने तरीक़े से चक्कर काट रहे हैं। और कक्षा किसी की भी गोल भी नहीं। जैसे सबके अपने-अपने शौक़ हों, अपना-अपना मिज़ाज हो। सब अपने-अपने मिज़ाज के अनुसार चल रहे हैं। तो यह चलता रहेगा।

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