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ये नहीं सनातन धर्म || आचार्य प्रशांत, दिल्ली विश्वविद्यालय सत्र (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले ढाई-तीन वर्षों से सुन रहा हूँ। जब मेरी आयु सत्रह वर्ष की थी, ट्वेल्थ (बारहवीं) करने के बाद, ग्रेजुएशन (स्नातक) के दौरान मैंने यूट्यूब पर आपको देखा। बाकी लोगों को भी सुनता था, फ़िर आपको भी सुनना स्टार्ट किया।

मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर से हूँ। मेरा जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ। आपको सुनने के बाद बहुत सारी चीज़ें हैं— जो जीवन के प्रति और समाज के प्रति जो जितनी भी चीज़ें होती हैं इर्द-गिर्द, केंद्र में होती हैं— वो सारी चीज़ें मेरे जीवन के अंदर प्रवेश कर गईं। उसके बाद उन सभी पर क्वेश्चन मार्क (प्रश्नचिन्ह) आने लगें, प्रश्न उठने लगें।

मैं हिंदू परिवार से हूँ, तो वहाँ पर जो मैं एक हिंदूइज़्म (हिंदुत्व) को देखता आया हूँ, वहाँ पर और जो मैं आपको सुनने के बाद, जो एक साइंटिफिक हिंदूइज़्म (वैज्ञानिक हिंदुत्व) को मैंने जाना, इसमें और उसमें बहुत ज़्यादा अंतर है‌। मैं एक संयुक्त परिवार से आता हूँ। क्योंकि वहाँ भी आज एक कल्चर (संस्कृति) है। बट (किंतु) यहाँ शहरों में नहीं है। वो चीज़ मैंने देखी है।

तो मेरे यहाँ सात औरतें हैं। तो उन सभी औरतों को मैं देखता हूँ, वो सारी मान्यताओं को मानती हैं। जितनी भी चीज़ें होती हैं हिंदू धर्म में, वो श्रृंगार हो, जितनी भी सारी चीज़ें हों, पति के लिए व्रत रखना हो, यह और, और भी बहुत सारी चीज़ें जो आप बोलते रहते हैं अक्सर।

लेकिन उन्होंने मुझे कभी उन किताबों की तरफ़, जैसे आप वेदों की बात करते हैं, उपनिषद् की बात करते हैं, भगवद्गीता की बात करते हैं, उनका ध्यान कभी उधर की ओर था ही नहीं। अगर उनका नहीं था, तो उस वजह से मेरा भी कभी नहीं गया है।

बट कहीं-न-कहीं सौभाग्य है, इस एरा (युग) में मैं पैदा हुआ हूँ, जहाँ पर इंफॉर्मेशन एज (सूचना युग) बोलते हैं इसको, जहाँ पर यूट्यूब है और नेट है हमारे पास। कहीं-न-कहीं से वो टकराहट हो गई है, कम उम्र में ही, मुझे लगता है। कहीं-न-कहीं कम उम्र में बहुत सारी चीज़ें पता चल गईं। और अब मेरे दिमाग में बहुत सारी चीज़ें उठीं, बाद में मुझे जवाब मिला कि हाँ, हिंदू धर्म वो नहीं है, जो मैं मानता आया हूँ, जो मेरी माँओं ने, मेरी घर की औरतों ने मुझे बताया।

ऐसा लगता था कि भगवान किसी और दुनिया की चीज़ हैं। पर एक साइंटिफिक टेंपरामेंट (वैज्ञानिक स्वभाव) उससे बढ़ा, तो मुझे लगा कि नहीं यह हमारी ही चीज़ें हैं और जो जितने भी अंधविश्वास थे, वो खत्म होने स्टार्ट हुए। पर मेरे घर में ऐसा नहीं हुआ। तो मेरा पहला सवाल यह है कि हमारे जो फैमिली में, हिंदूइज़्म में, वो अलग क्यों है? वो इतना अलग क्यों है? जो आप ने दिखाया, वो बिल्कुल अलग क्यों है?

इससे मुझे वास्तविकता मिलती है, बस उस से नहीं मिलती। पहला सवाल यह है। दूसरा मुझे लगता है कि मैं जिस काल में पैदा हुआ हूँ, आप से ही सुना, थोड़ा-सा मैं नॉर्मल होने की कोशिश कर रहा हूँ, तो आपने बताया, कंज़्यूमरिज़्म (उपभोक्तावाद) चल रहा है। फ़िलहाल मैंने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है। मैं मुखर्जी नगर में कॉम्पिटेटिव एग्ज़ाम (प्रतियोगी परीक्षा) की प्रिपरेशन (तैयारी) कर रहा हूँ।

हो सकता है, मेरे परिवार की वजह से मैं इस क्षेत्र में आगे आया हूँ। इसमें मेरा कोई भी योगदान नहीं है। मैंने आज तक भगवद्गीता उठा के पढ़ी नहीं है। वो तो आचार्य जी की बातों को सुनता आया हूँ, अब दिलचस्पी बहुत है, पर हो सकता है कॉम्पिटीशन की वजह से और हो सकता है, मेरी कामचोरी भी है कि मैं नहीं पढ़ता हूँ। मैं अपनी किताबों को पढ़ता हूँ, सिलेबस (पाठ्यक्रम)को पढ़ता हूँ, पेपर क्लियर करना मेरा एम (उद्देश्य) है इस टाइम पर।

पर कहीं-न-कहीं इस उम्र में हूँ, तो मुझे अब लगता है कि समाज में इतनी सारी चीज़ें चल रही हैं, जो आपने बताया। पहली बात बॉलीवुड को लेकर आप बहुत कुछ बोलते हैं मैं भी पिक्चरें (चलचित्र) देखने जाता हूँ। अभी फ़िलहाल में के.जी. एफ.टू आया! मुझे नहीं पता मैं क्यों गया? पर गया! मैं शिकार हूँ उस चीज़ का। दूसरा कंज़्यूमरिज़्म ! मुझे नहीं पता….? मेरे पास, एक जोड़ी में भी काम हो सकते हैं, वो चाहे कपड़े हों, चाहे जूते हों। मेरे पास एक से अधिक हैं। मुझे नहीं पता।

हम यह शिकार क्यों हैं और हम यह उस ओर क्यों बढ़ते चले जा रहे हैं? मैं आपको सुनता हूँ, फ़िर भी मैं कंट्रोल में नहीं हूँ। मैं निरंतर उस ओर जा रहा हूँ। वेस्टर्न कल्चर (पाश्चात्य संस्कृति) कह लीजिए आप, कोई भी टर्म दे दीजिए, जिससे आपको आसानी हो समझने में। ऐसा क्यों है? यह दूसरा सवाल था मेरा। धन्यवाद।

आचार्य प्रशांत: हिंदू धर्म का बड़े-से-बड़ा दुर्भाग्य रहा है कि उसमें कर्मकांड को प्रधानता मिली। इतनी प्रधानता मिली कि आम हिंदू अपने धर्म का मतलब ही यही समझता है– रीति-रिवाज, प्रथाएँ, परंपराएँ, सौ तरीके के कर्मकांड, मान्यताएँ, अंधविश्वास। इसी को मान लिया गया है कि यही तो धर्म है।

यह पक्ष धर्म का क्यों आगे आया? क्योंकि यह आम बुद्धि को सरल पड़ता है और इसका कोई उत्तर नहीं है। यह आम बुद्धि को सरल पड़ता है और आम बुद्धि में उन पुरोहितों की बुद्धि भी शामिल है, जिन पर दायित्व था कि धर्म का असली अर्थ आम जनता को बताएँ। उन्हें स्वयं नहीं समझ में आया! कुछ उन्हें समझ में नहीं आया, कुछ उनका स्वार्थ इसमें था कि आम जनता को कर्मकांड में ही उलझा कर रखें, क्योंकि कर्मकांड में जजमानी मिलती है, दान-दक्षिणा मिलती है।

वेदांत में तो स्वाध्याय है। वेदांत में तुम किसको जाओगे दान-दक्षिणा करने? तो जो वास्तविक अध्यात्म है, भारतीय दर्शन में जो केंद्रीय हीरा बैठा हुआ है, वो आम जनता में कभी प्रचलित ही नहीं होने पाया। धर्म का मतलब ही यही बन गया है– इस तरह से पूजा करनी है, फ़लानी जगह दूध चढ़ाना है, फ़लाने पेड़ पर धागा बाँधना है, फ़लानी तारीख़ को फ़लाना व्रत रखना है, फ़लाने पेड़ के नीचे से नहीं गुज़रना है, इस देवता को फ़लाना अन्न चढ़ाना है। अक्षत ऐसे लाना है।

लंबी-चौड़ी विधियाँ! यह-वो पचास तरीके की बातें, जिनसे कुछ होता नहीं है। पौराणिक किस्से-कहानियाँ! यह सब कुछ धर्म बनकर रह गया। वजह ले-देकर के यही समझ लो कि चीज़ जितनी ऊँची और जितनी असली होती है, वो उतनी मुश्किल से आगे बढ़ती है। यह मानव प्रकृति है।

जो मैं कर रहा हूँ, वो करने के लिए मुझे बहुत मेहनत पड़ती है। तब भी जैसा तुमने कहा, तुम मुझे सुनते भी हो फिर भी बार-बार फिसल जाते हो। लेकिन जितनी भी मूर्खतापूर्ण चीज़ें होती हैं, वो अपनेआप आगे बढ़ती हैं। तुम कह रहे हो, तुम यूट्यूब पर मुझे सुनते हो। तुम तक अपना वीडियो पहुँचाने के लिए संस्था को बहुत खर्च करना पड़ता है। हमारे पास जितना आता है, लगभग सब कुछ चला जाता है, प्रचार में ही।

लेकिन बेवकूफ़ी से भरे हुए, भौंडेपन से भरे हुए और मूर्खता से भरे हुए वीडियो वायरल होते रहते हैं। सिर्फ़ वही वायरल होता है। और वहाँ उनको लाखों-करोड़ों लोग देख रहे होते हैं। वास्तव में लाखों-करोड़ों लोग, अगर किसी वीडियो को देख रहे हैं या किसी भी चीज़ की तरफ़ जा रहे हैं— फिल्म हो सकती है— तो संभावना यही है कि वो बहुत बड़ी बेवकूफ़ी से भरी हुई कोई चीज़ होगी। क्योंकि आदमी की प्रकृति ही ऐसी है। हम बेवकूफ़ हैं और हमें बेवकूफियाँ ही ज़्यादा पसंद आती हैं।

स्कूल आपको ज़बरदस्ती भेजना पड़ता है। और बाकी कितने सारे काम हैं, जिनसे आपको ज़बरदस्ती रोका भी जाए, तो आप नहीं रुकते। जानते हो कि नहीं जानते हो? और स्कूल जाते हो, धैंऽऽऽ! रो रहे हैं! चिल्ला रहे हैं! माँ पकड़ के बस में फेंक रही है। वहाँ से भी कूदने की धमकी दी। सारे काम कर लिए। इसी से समझ लो कि बचपन से ही हमारा रुझान किधर को रहता है ।

फिसलने की ओर हमारा रुझान है, क्योंकि फिसलने में ज़रा भी ऊर्जा नहीं लगानी पड़ती न? बैठ जाओ, फिसल जाओगे! और ऊपर चढ़ने में बड़ी मेहनत लगती है। जैसे पहाड़ पर चढ़ाई चढ़ रहे हो, तो कोई करना नहीं चाहता। इसीलिए, जो बिल्कुल, एकदम व्यर्थ की, दो कौड़ी की चीज़ें होती हैं, वो आम जनता में बड़ी आसानी से फैल जाती हैं।

किसी को यह बताना बहुत आसान है न कि सोमवार को व्रत रख लो, तुम्हें खूब पैसा मिल जाएगा। और किसी को यह समझाना कितना मुश्किल है– "अयम् आत्मा ब्रह्म"। यह आत्मा ही ब्रह्म है, कैसे समझाऊँ? वो कहता है, मुझे यही बता दो बस। कौन-से पेड़ पर कौन-सा धागा बाँधना है, जिससे मन्नत पूरी हो जाए? तो बताने वालों ने बता भी दिया और यह भी कह दिया कि जब वो धागा बाँधना, तो साथ में सौ रुप्पैया वहाँ चढ़ा भी देना।

तो बढ़िया है। वो महिला भी खुश हो गई जिसको धागा बाँधने को मिल गया और उसको दिलासा मिल गया कि अब मेरी सारी मुरादें पूरी हो जाएँगी और जिन्होंने सलाह दी थी, उनको सौ रुप्पैया भी मिल गया। दोनों ओर खुशी-ही-खुशी। अब होगा कोई खड़ा, यह बताने वाला– "अहम् ब्रह्मास्मि"। वो मुँह ताक रहा है! वो कहेगा, 'यह मैं किस को बताऊँ? वो सुनने को कोई तैयार ही नहीं है।'

क्योंकि "अहम् ब्रह्मास्मि" बताया, तो अहम् को ही बहुत बुरा लगता है। अहंकार यह नहीं सुनना चाहता कि वो ब्रह्म है। अहंकार यह सुनना चाहता है कि मेरी उम्मीदें, मेरी चाहतें कैसे पूरी होंगी। उसको तो यह बताओ। उसको बस बता दो कि फ़लाने मंदिर में जाकर के तुम्हारी सब मुरादें पूरी हो जाती हैं। वो चला जाएगा। कहीं चादर चढ़ाने से कुछ हो जाता है, वो भाग के जाएगा वहाँ पर।

तुम उसको समझाओ मन का विज्ञान, वो नहीं सुनना चाहता। तुम उसको भूत-प्रेत, टोना-टोटका बताओ, वो एकदम तैयार हो जाएगा– ‘हाँ, और बताओ और बताओ! फिर क्या हुआ? फिर कैसे हुआ? पैरानॉर्मल (असाधारण) कैसे होता है?’

तो इंसान की मूल प्रकृति को समझो! हम कौन हैं, इस बात को जानो! हम जंगल से ताज़ा-ताज़ा निकले जानवर हैं। हमारी बुद्धि कोई जागृत नहीं हो गई। हमारे भीतर एक दीया है तो जरूर, पर वो जला हुआ नहीं है। प्रज्वलित नहीं है, वो बिल्कुल भी। बड़ी मेहनत से वो दीया जलाना पड़ता है। वो मेहनत करने को हम तैयार नहीं होते। और इसमें भी कारगुज़ारी इस शरीर की ही है‌।

यह जो प्रकृति है, इसमें जो सबसे प्रधान गुण है– वो है तमसा। तमसा माने आलस। तमसा माने एक अंधेरी रात, जिसमें तुम नशे में डूबे हुए हो, बेहोश पड़े हो। तुम मेहनत करना चाहोगे? रात में धुत पड़े हुए हो, खूब पीकर के, दो तीन बजे हैं, इसी का नाम जीवन है। जीवन समझ लो, एक लंबी अंधेरी रात है, जिसमें तुम बेहोश पड़े हो, जिसमें कोई प्रकाश नहीं, जिसमें कोई बोध नहीं। कौन मेहनत करना चाहेगा?

वो धुत पड़े हैं, मज़ा आ रहा है पड़े रहने में। कोई झिंझोड़ के भी उठाना चाहे, तो हम उठना नहीं चाहते। कौन श्रम करे? कोई सस्ती चीज़ बता दो! कोई ऐसी चीज़ बता दो, जो आसानी से हो जाए, कर लेंगे।

अब आसानी से तो सिर्फ़ अंधविश्वास ही फैलते हैं, तो अंधविश्वास फैले हुए हैं।

यह कितनी विचित्र बात है कि वेदांत को विदेशियों ने भारत से ले लिया। भारत से जितनी भी तमाम धार्मिक धाराएँ बहीं, वो सब मूलतः वेदांत पर ही आधारित हैं। सबको वेदांत से लाभ हो गया; हिंदुओं को ही वेदांत से लाभ नहीं हुआ।

'रात और दिन दीया जले, मेरे घर में फिर भी अंधियारा है।'

जहाँ से दीया जला था, वहीं प्रकाश नहीं होने पाया। पूरी दुनिया प्रकाशित हो गई। हिंदुओं का ही घर अंधेरे में रह गया और दीया हिंदुओं का ही था। (सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा)

और आज भी, अब, जब बहुत बात होती है, हिंदू पुनर्जागरण वगैरह की, तो उसमें भी उन्हीं चीज़ों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो हमारा अभिशाप रही हैं। कोई नहीं वेदांत की बात कर रहा। आज भी वही बातें हो रही हैं कि हम जुलूस कितना लंबा निकालेंगे, हम तमाम तरीके की प्रथाएँ कैसे और आगे बढ़ा दें– यही सब बातें हो रही हैं। और अंधविश्वासों को पुख़्ता करने की बातें हो रही हैं। सामाजिक, राजनैतिक हर तल पर।

लेकिन जो केंद्रीय दर्शन है, जिसमें सार है, जिसमें मुक्ति है; उसकी कोई बात नहीं करना चाहता, क्योंकि वो बात ज़रा कठिन पड़ती है। और कठिनाई का रास्ता कोई लेना नहीं चाहता। इतना और समझ लेना कि कर्मकांड और जाति व्यवस्था एक-दूसरे से एकदम जुड़े हुए हैं। इन्हीं कर्मकांडों का परिणाम है कि हिंदू अकेले समुदाय हैं दुनिया में जिन्होंने अपने ही भाइयों के ख़िलाफ़ भेदभाव किया।

इतनी सारी और धार्मिक धाराएँ और पंथ है दुनिया में, वो सब यह कहते हैं कि हम ऊँचे हैं और दूसरे नीचे हैं। तुम किसी भी धर्म के लोगों से मिलो, उनमें सब में यह छुपी हुई भावना रहती है कि हम ऊँचे हैं, हम बेहतर हैं, हम भगवान के, गॉड के, अल्लाह के चुने हुए लोग हैं और बाकी सब हमसे नीचे के लोग हैं।

हिंदू अकेले लोग हैं दुनिया के, जिन्होंने अपने ही घर के भीतर ऊँच-नीच बना दी। उन्होंने कह दिया हमारे ही भीतर कुछ लोग ऊँचे हैं, कुछ लोग नीचे हैं। यह सब कुछ इसी कर्मकांड से जुड़ा हुआ है। यह हम समझ ही नहीं पा रहे।

हमें वेदांत से ज़्यादा मनुस्मृति प्यारी है। हमने अष्टावक्र का नाम नहीं सुना। हम दत्तात्रेय को नहीं जानते। कोई हमसे याज्ञवल्क्य बोल दे, हम पूछेंगे, ‘कौन?’ हमें यह सब नहीं पता। हाँ, हमें धर्म के नाम पर पौराणिक कहानियाँ खूब पता हैं। ‘फिर उसने ऐसा कहा, फिर फ़लाने ऋषि ने ज़ोर से ज़मीन पर लात मारी, तो वहाँ से एक नदी निकल पड़ी!’ यह धर्म है? तुम यह बच्चों की कहानियाँ, यह परी कथाएँ, कॉमिक स्ट्रिप , इसको तुम धर्म बोलते हो?

‘फिर फ़लानी अप्सरा उड़ती हुई जा रही थी, नीचे ऋषि तपस्या कर रहे थे, तो अप्सरा ने अपना वस्त्र उनके ऊपर डाल दिया, तो ऋषि ने वस्त्र को भस्म कर दिया, फिर उसकी जहाँ पर राख पड़ी, वहाँ हर साल एक मेला लगता है। और जितनी औरतें उस मेले में जाकर, वहाँ की मिट्टी अपने माथे पर लगाएँगी, वो सदा सुहागन रहेंगी।’ यह धर्म है! यह धर्म है? यह बेवकूफ़ी धर्म कहलाती है!

पर आम आदमी धर्म के नाम पर इससे आगे कुछ नहीं जानता। वो थाली ले लो, उसमें छेद कर लो, उसमें से चाँद को देखो। यह धर्म है? (दोबारा सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा) इनसे बोल दो, बृहदारण्यक! इन्हें छः दिन लगेंगे उच्चारण करने में! पर करवा चौथ इन्हें खूब पता है। तो फिर इसीलिए भारत देश की इतनी दुर्गति भी हुई न!

आदमी क्या है? आदमी अपनी चेतना है। तुम्हारी चेतना ही अगर मिट्टी में मिल गई है, तो तुम दुनिया में फिर हर क्षेत्र में पिछड़े हुए रहोगे। न तो तुम कोई आविष्कार कर पाओगे, न तुममें कोई बल रहेगा। आज भारतीयों को देखो न! एक सौ चालीस करोड़! तुम कोई एक क्षेत्र दिखा दो, जिसमें भारत अग्रणी हो और अब तो आज़ाद हुए भी इतने दशक बीत गए। अब हम वो मजबूरी भी नहीं बता सकते।

वजह बस यही है– वेदांत का जो हमने अपमान करा है, हमें उसकी सज़ा मिल रही है। धर्म के नाम पर यह जो हम मूर्खताएँ चला रहे हैं, हमें उसकी सज़ा मिल रही है। कहते हैं हम कि वेद हमारे सर्वोच्च ग्रंथ हैं और वेदों के ही दर्शन को वेदांत बोलते हैं। आपको अगर वेदांत नहीं पता, तो आप किस हक़ से अपनेआप को हिंदू बोलते हो? और फिर उसी का परिणाम है कि हर तरीके से पिछड़े हुए हो। हर तरीके से!

जिन चीज़ों में हम आगे हैं, वो यही हैं– हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप), डायबिटीज (मधुमेह), क्राइम (अपराध), पॉल्यूशन (प्रदूषण)। इनमें सबसे आगे हैं! बाकी, चाहे विज्ञान का क्षेत्र हो, चाहे एकेडमिक्स (शैक्षणिक) हो, एंटरटेनमेंट (मनोरंजन) हो, आर्ट्स (कला) हो, स्पोर्ट्स (खेल) हो, हम कहाँ हैं? क्योंकि हर काम में उत्कृष्टता के लिए बल चाहिए।

कृष्ण अर्जुन को कहते हैं, पूरा विभूति योग यही है कि, ‘जहाँ कहीं भी ऐश्वर्य है, वो मेरे ही दम से है अर्जुन! और जहाँ मैं नहीं हूँ, वहाँ पर कोई उत्कृष्टता नहीं मिलेगी तुम्हें। एक्सीलेंस (उत्कृष्टता) मिलेगी ही नहीं।’

हमारे जीवन में कहाँ कृष्ण हैं? हमने तो कृष्ण की जगह पकड़ भी लिया है, तो कान्हा को। कौन से कान्हा? वो ही मक्खन-मलाई खिला दो! पालना झुला दो! गीता वाले कृष्ण; उनसे हमें कोई मतलब ही नहीं है। अब कोई ताज्जुब है कि हमारी इतनी बुरी हालत है। हज़ारों साल तक हम पिटते रहे हैं। और उसमें फिर हम फ़क्र बताया करते हैं।

‘कुछ बात तो है कि, हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहाँ हमारा।’

यह नहीं बोलते कि सदियों तुम पिटते रहे हो, लात खाई है‌। बहुत इस बात में गुरूर आ रहा है कि देखो हम मिटे नहीं। मिटे कैसे नहीं? भौगोलिक रूप से भी एक छोटे से क्षेत्र में सिमट के रह गए हो। कहाँ है तुम्हारा अफगानिस्तान? कहाँ है तुम्हारा पाकिस्तान? कहाँ है तुम्हारा बांग्लादेश? बताओ मुझे! एक समय पर इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया, कहाँ हैं वो सब? बताओ! और बोल रहे हो कि मिटे नहीं! मिटना और किसको बोलते हैं? लद्दाख को भी अब गँवा रहे हो। मिटना और किसको बोलते हैं?

और इस हार का कारण रहा है– बल का अभाव। और बल आता है, सत्य से! तमाम तरह की परंपराओं और प्रथाओं से सत्य नहीं आता। वेदांत से सत्य आएगा, क्योंकि वेदांत अकेला है, जो सत्य का अनुसंधान करना चाहता भी है। बाकियों को तो सत्य से कोई मतलब ही नहीं है।

तुम जो बाकी प्रथाएँ-परंपराएँ करते हो, क्या वो ऐसा कहती भी हैं कि वो सत्य के लिए हैं, सच्चाई के लिए हैं? न! वो तो मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए हैं। वेदांत नहीं कहता कि वो तुम्हारी मनोकामनाओं की पूर्ति करना चाहता है। वो कहता है– हमें सच्चाई जाननी है। चाहे अच्छी लगे या बुरी, हम सच्चाई जानने में उत्सुक हैं। हर तरीके की प्रगति सिर्फ़ सच्चाई से आ सकती है।

जिन लोगों की धर्म में ज़रा भी रुचि हो या जिन भी लोगों को अपनेआप को हिंदू कहने का शौक हो या हिंदू कहने में गौरव हो, मैं उनसे साफ़ निवेदन कर रहा हूँ, वेदांत के बिना हिंदू जैसा कुछ नहीं। मूर्ति पर फूल चढ़ाने से या होली, दिवाली मनाने से आप हिंदू नहीं हो जाओगे।

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