निर्वाण षट्कम, महाशिवरात्रि

Acharya Prashant

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निर्वाण षट्कम, महाशिवरात्रि
तो निर्वाण षट्कम का जो पहला ही श्लोक है, वो नकारता है। किसको नकारता है? वो सब कुछ जो अनात्म है। इसलिए निर्वाण षट्कम को आत्म-सूत्र या आत्म षट्कम भी कहा जाता है। क्या-क्या नकारना है? वो सब जो मैं नहीं हूँ। वो सब जो मुझे बाँध कर, रोक कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। तो वास्तविक महाशिवरात्रि मात्र कोई एक विशेष दिन नहीं हो सकती। जिस दिन हम अपनी स्थितियों को, तकलीफ़ों को, अड़चनों को लाँघ कर चेतना का चुनाव करते हैं, एक ऊँचा निर्णय करते हैं, वही शिवत्व है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योमभूमि- र्न तेजो न वायुः चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।

~निर्वाण षट्कम

आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का पर्व है। सबसे पहले तो आपका आभार। मेरे लिए बहुत मार्मिक बात रहती है, हृदय-स्पर्शी बिल्कुल आप लोग। आप लोग दूर से आते हैं, देश के कई कोनों से, कुछ लोग विदेशों से भी आए हैं। सबसे पहले तो आपका आभार।

मेरे लिए बहुत एक महत्त्वपूर्ण दिन होता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि आज महाशिवरात्रि है, बल्कि इसलिए क्योंकि जहाँ कहीं भी व्यक्ति शारीरिक, भौतिक, सांसारिक स्थितियों की बाधाओं की परवाह किए बिना वो करे जो चित्-स्वरूप है, जो चेतना-सम्मत है, उसको ही शिवत्व कहते हैं।

तो वास्तविक महाशिवरात्रि मात्र कोई एक विशेष दिन नहीं हो सकती। जिस दिन हम अपनी स्थितियों को, तकलीफ़ों को, अड़चनों को लाँघ कर चेतना का चुनाव करते हैं, एक ऊँचा निर्णय करते हैं, वही शिवत्व है। तो आपका यहाँ होना ही वास्तविक महाशिवरात्रि है। बाधाओं को लाँघ कर सिर्फ़ आप ही तक नहीं आते, मेरी भी बाधाएँ हैं। तो ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि बात सिर्फ़ एक ओर से है। मेरी बाधाएँ बड़ी विकट रहती हैं।

निर्वाण षट्कम है, उसे स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। तो उसे आत्म षट्कम भी कहते हैं। निर्वाण षट्कम, आत्म षट्कम।

हम बात कर रहे हैं, लाँघने की, बाधाओं की। वो जो लाँघने का भाव है, वही शिवत्व का मूल है। सामने है चुनौती और उससे मैं रुका नहीं उसको पार कर गया, यही शिवत्व है। बाक़ी तो जो हमारी अवधारणाएँ हैं, जो हमने रूप दिए हैं शिव को, शिव-संबंधित हमारी जो कथाएँ हैं, वो बस उसी मर्म का विस्तार मात्र हैं।

तो निर्वाण षट्कम का जो पहला ही श्लोक है, पहला ही छंद है, वो क्या करता है? वो नकारता है। किसको नकारता है? वो सब कुछ जो अनात्म है। इसलिए निर्वाण षट्कम को आत्म-सूत्र या आत्म षट्कम भी कहा जाता है। क्या-क्या नकारना है? वो सब जो मैं नहीं हूँ। वो सब जो मेरे रास्ते में बाधा है। वो सब जो मुझे बाँध कर, रोक कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है।

आज हम बहुत सारी बातें करेंगे, लंबा सत्र है। लेकिन हम जितनी भी बातें करें, उनके मूल में शिवत्व होना चाहिए। अक्सर वो बात हमें दिखाई नहीं देती है, क्योंकि उत्तर एक रूप में हमारे सामने आता है। उसमें आवश्यक नहीं है कि हम शिव का उल्लेख करें ही। लेकिन जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।

तो आवश्यक है कि आज हम जितनी भी बातें करें, उनमें एक चुनौती रहे। वही चुनौती जब ऊर्जा के साथ बोली जाती है, तो हम कह देते हैं कि ललकार है, दहाड़ है। क्या कह रहे हैं पहली ही बात:

“मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम्।”

अंतःकरण चतुष्टय होता है, कि आप जिसको भीतर अनुभव करते हैं; अंतःकरण-चतुष्टय, वो क्या होता है? तो उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आते हैं। तो पहली चीज़ तो ये कि आपके भीतर जो कुछ भी अनुभव होता है, प्रतीत होता है उसको बहुत महत्त्व नहीं देना है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। तो महत्त्व फिर किसको देना है? इनको हटाने के बाद एक शुद्धता बचती है। इनको हटाने के बाद मात्र एक शुद्धता बचती है, या बचनी चाहिए। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे, यही शिवत्व का मूल है।

मन नहीं, बुद्धि नहीं, चित्त नहीं, अहंकार नहीं; माने क्या? कि बुद्धि से काम नहीं करना है? नहीं। बुद्धि मालिक नहीं होनी चाहिए।

क्या अहम् ये कह देने भर से हट जाएगा कि मन नहीं, बुद्धि नहीं, चित्त नहीं, अहंकार नहीं? नहीं, अहंम् की जो प्राकृतिक वृत्तियाँ हैं वो मालिक नहीं होनी चाहिए। मन नहीं, अहम् है तो मन होगा। पर अहम् ने मन में जितने भी विषय बैठा रखे हैं, कोई भी विषय जो वास्तविक विषय है, जो सद्-विषय है, उससे अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होना चाहिए। ये पहली बात का अर्थ है।

चारों बातें जो बोली गईं अंतःकरण चतुष्टय में, उन सबसे ऊपर शुद्ध प्रेम आना चाहिए; शुद्ध प्रेम। मुझे शुद्ध प्रेम कहने की ज़रूरत नहीं है, प्रेम अपने आप में पर्याप्त है। पर “शुद्ध” कहने से एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात का दोहराव हो जाता है कि प्रेम कामना नहीं है। आमतौर पर हम प्रेम को कामना से समानार्थी ले लेते हैं। तो शुद्ध प्रेम करके बस इतना ही कि कामना वाला प्रेम नहीं। कौन सा प्रेम? वो जो अहम् का आत्मा के प्रति होता है; वो जो अहम् का अपनी ही शुद्धता के प्रति होता है।

वो मालिक रहे, फिर ये चारों उसके पीछे चल सकते हैं। कौन से चार? मन, बुद्धि?

श्रोता: चित्त, अहंकार।

आचार्य प्रशांत: फिर ये चारों उपयोगी संसाधन हो जाते हैं। फिर ये सेवक कहिए तो सेवक, मित्र कहिए तो मित्र हो जाते हैं। इन्हें किसके पीछे चलना है? प्रेम के पीछे। वो प्रेम क्या है? मुझे बेहतर होना है, स्वयं के प्रति ही प्रेम। इसलिए तो आत्म-सूत्र या आत्म-षट्कम्, स्वयं के प्रति ही प्रेम। हमारी पहली ज़िम्मेदारी किसके प्रति है?

अब यहाँ भी जैसे मैंने कहा था कि शुद्ध प्रेम कहने की ज़रूरत नहीं प्रेम ही पर्याप्त होना चाहिए था। वैसे ही मैंने “पहली ज़िम्मेदारी” सिर्फ़ इसलिए कहा है क्योंकि हम मानेंगे नहीं, अगर हमसे कह दिया जाए कि एक ही ज़िम्मेदारी है, एक ही कर्तव्य है, और वो अपने प्रति है; बाक़ी सारे कर्तव्य तो पूरे हो जाते हैं अपने आप, अगर पहला पूरा हो जाए। जो पहला कर्तव्य है अपने ही प्रति, अगर वो पूरा हो गया तो बाक़ी सब हो गए पूरे।

ऐसा हो नहीं सकता कि कोई व्यक्ति आत्मस्थ है और उसके द्वारा उसके सभी ऊँचे, सही, सम्यक कर्तव्यों का निर्वाह न हो रहा हो। ये संभव नहीं है। तो मैंने कहा आपसे कि पहली ज़िम्मेदारी वास्तव में वो पहली नहीं है, वो एकमात्र है। मनुष्य की एकमात्र ज़िम्मेदारी, एकमेव कर्तव्य मात्र अपने प्रति होता है। और ये कह कर के हम जो बाक़ी कर्तव्य हैं उनसे पिंड नहीं छुड़ा रहे, उनकी इतिश्री नहीं कर रहे। हम कह रहे हैं अगर पहला कर्तव्य पूरा हो रहा है, तभी बाक़ी सबके सही चुनाव की और सही निष्पादन की कोई संभावना बनती है।

अगर मालिक ही ठीक नहीं है, अगर पहला, प्रथम ही ठीक नहीं है, तो उसके पीछे-पीछे आप जो भी कुछ कर रहे हैं, आप अपने आपको कितना भी श्रेय देते रहें कि आप कर्तव्यनिष्ठ हैं, आपने बहुत मेहनत करी है अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने में, बात बनेगी नहीं। पहली ही चीज़ ठीक नहीं है।

ऐसी बात है कि जैसे आपने गलत मंज़िल चुन करके गलत रास्ता ले लिया हो। उसके बाद आप पचास बातें बता रहे हैं अपने पक्ष में, जैसे कि मैं बहुत सँभाल के गाड़ी चलाता हूँ, मैं सारे गड्ढे बचाता हूँ, मैं किसी भी ट्रैफ़िक नियम का उल्लंघन नहीं करता हूँ, मेरी माइलेज देखिए, कंपनी भी बोलती है कि 15 से ऊपर नहीं आएगी, मैं 18 की लाता हूँ। आप कुछ भी बोल लीजिए, डिपर देता हूँ, ज़्यादा हॉर्न नहीं बजाता हूँ। अपने पक्ष में आप जितनी भी बातें बोल लीजिए कि मैंने ये अच्छा करा, वो अच्छा करा, ये मेरी ज़िम्मेदारी थी, ये मेरा कर्तव्य था, ये मेरे नियम थे, मैंने सबका पालन करा।

आपने करा होगा सब नियमों का, सब कर्तव्यों का पालन। आपने पहले ही कर्तव्य का पालन नहीं करा, तो बाक़ी जितने पालन थे, सब व्यर्थ हुए कि नहीं?

तो ये आम आदमी की ज़िंदगी होती है। ये आम संसारी की विडंबना होती है, इसी में उसका दुख है। वो मेहनत तो बहुत करता है। गाड़ी तो चल रही है न। गाड़ी चल रही है, और गाड़ी चलाने में अपनी ओर से हम सावधानी भी बरत रहे हैं। बरत रहे हैं न? कोई ऐसा नहीं है जिसके दिमाग पर कर्तव्य न हो। बहुत महत्त्वपूर्ण शब्द है ये कर्तव्य; बहुत बार कहता हूँ, सोच-समझ के चुनना चाहिए। कोई ऐसा नहीं होता जिसके दिमाग पर कर्तव्य न हो। कोई ऐसा नहीं होता जो श्रम न कर रहा हो। कोई ऐसा नहीं होता जो कुछ पाने के लिए कुछ खो न रहा हो।

समय सब लगा रहे हैं, ऊर्जा सबकी जा रही है, कष्ट भी सभी भोग रहे हैं। तो हमें ये भाव आ जाता है कि इतना कुछ हम कर रहे हैं, लेकिन जीवन ही हमारे प्रति अन्यायपूर्ण है। हम सब कुछ तो अपनी ओर से ठीक ही कर रहे हैं, फिर भी हमें दुख मिल रहा है। ये ज़िंदगी हमारे साथ नाइंसाफ़ी कर रही है, ऐसी भावना आ जाती है न। ये वैसी ही बिल्कुल भावना है कि सारे गड्ढे बचाकर चलाए, डिपर मारा, हॉर्न नहीं मारा, कभी भी ज़बरदस्ती लेन नहीं बदली, नियम-क़ायदों को कभी तोड़ा नहीं, जितनी बातें सिखाई गई थीं उनसे कभी डिगा नहीं, लेकिन उसके बाद भी मंज़िल मिली नहीं। ये ज़िंदगी ही गड़बड़ है। तभी तो बुद्ध बोल गए थे कि दुख पैदा होने का मतलब ही दुख है।

नहीं पैदा होने का मतलब दुख नहीं है। पैदा होने का अर्थ दुख हमारे लिए इसलिए हो गया है क्योंकि हम पहली ही चीज़ का सही चुनाव नहीं करते। जो पहली बात है, निर्वाण षट्कम के पहले छंद में, वो यही है कि पहली चीज़ ठीक रखो। और इन चारों में से कोई भी पहला नहीं हो सकता।

आपकी बुद्धि आपको कोई बात सुझा रही है, वो पहली नहीं हो सकती। बुद्धि कोई मालकिन है कि बुद्धि ने कोई बात बोली और आपने तर्क लगा लिया; बोले, देखो, बात तर्क-सम्मत है, इसलिए मैं मानूँगा? नहीं। लक्ष्य सही होना चाहिए। एक बार पता है कि मुझे पहुँचना कहाँ है, फिर बुद्धि लगाइए कि रास्ता क्या चुनना है। फिर बुद्धि लगाइए कि गाड़ी में और किसको बैठाना है। फिर बुद्धि लगाइए कि सामान क्या साथ लेकर जाना है। पहली चीज़ ठीक होनी चाहिए न।

जो मर्मज्ञ हैं, वो बोलेंगे, सिर्फ़ पहली चीज़ ठीक होनी चाहिए, बाक़ी की परवाह छोड़ दो; वही बेफ़िक्री है, वही तो प्रसाद है अध्यात्म का, कि एक साधे, सब सधे। एक चीज़ ठीक कर ली, बाक़ियों की फ़िक्र छोड़ दो, वो अपने आप ठीक हो जाती हैं। लेकिन अभी हम बोल देंगे कि बाक़ी छोड़ दो, तो हमें बड़ी चिंता आ जाएगी।

तो मैं आपसे ये नहीं कह रहा हूँ कि बस एक की फ़िक्र करो। मैं कह रहा हूँ, उसको पहला रखो, बाक़ियों को उसके पीछे रखो। मैं आपसे कह रहा हूँ, आप पंद्रह चीज़ों की फ़िक्र कर लीजिए, सांत्वना, कोई समस्या नहीं। जो भी पंद्रह चीज़ें हैं ज़िंदगी में, आप सबको अपना समय दे दीजिए, ऊर्जा दे दीजिए, अपनी सब ज़िम्मेदारियों का पालन कर लीजिए। लेकिन पहला इनमें से किसी को मत रखिए।

ये तो हमारे सामने सिर्फ़ पहला श्लोक है। षट्कम का अर्थ ही है कि कितने श्लोक होंगे? छह। और सब के सब मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। पर बात ये है कि अगर हम सारे छह श्लोक ले लेंगे, तो आज फिर आपके प्रश्नों पर चर्चा नहीं हो पाएगी। नहीं तो बहुत अच्छा तो यही रहता कि पूरा निर्वाण षट्कम् ही ले लेते। खैर वो पहले उस पर बात करी हुई है, और वो सब प्रकाशित भी है, तो वहाँ देखा जा सकता है। कोशिश करेंगे अंत में कि एक छंद और ले लें, चाहे दूसरा, या फिर आख़िरी, कोई भी।

तो आख़िरी शायद ज़्यादा उचित रहेगा, क्योंकि उसमें फिर सकार की भाषा में बताया भी है, “अहं निर्विकल्पो, निराकार रूपो,” कि मैं हूँ कौन। बाक़ी तो सब जगह बस नकार ही नकार है।

तो इनको कभी अपना मालिक नहीं बनने देना है। इनसे क्या करना है? इनसे काम लेना है। मालिक कौन रहेगा? मेरी शुद्धता। और पैदा ही हुआ हूँ मैं थोड़ा गंदा, रंजित, “अंजन सकल पसारा रे।”

मैं पैदा ही कैसा हुआ हूँ? थोड़ा गंदा। तो मुझे एक ही काम करना है जीवन में कि जिधर शुद्धता हो, उधर बढ़ते रहना है। यही शिवत्व है।

यही महाशिवरात्रि का संदेश है। जिधर शुद्धता हो, उधर तुम्हारा प्रेम हो। और उधर बढ़ने के लिए इन सबका उपयोग कर लेना। किनका? मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इन सबका उपयोग कर लेना, उधर को बढ़ने को जिधर को शुद्धता हो। प्रेम पहला रहे। प्रेम बुद्धि के पीछे नहीं चल सकता, कि बुद्धि ने तर्क लगाकर दे दिया कि वहाँ प्रेम कर लो, फ़ायदा हो जाएगा।

श्रीकृष्ण गीता में साफ़ बता गए हैं कि ये सब किसके पीछे चलते हैं, बुद्धि इत्यादि, अहम् के पीछे चलते हैं। मन हम जानते ही हैं कि अहम् का मोहल्ला है। अहम् ने अपने चारों ओर जो आबादी बसा रखी है, उसको मन बोलते हैं। बुद्धि अहंकार की सेविका है। चित्त में वही सब रहता है जो अहंकार को प्रिय होता है। तो ये भले ही चार यहाँ लिखे हुए हैं, ये वास्तव में चारों क्या हैं? एक। तो इनमें से किसी का भी अनुगमन करना माने अहंकार का ही अनुगमन करना। इस चार में से बाक़ी तीन तो अहंकार के ही पीछे-पीछे हैं।

इनके पीछे नहीं चलना है। अपनी प्रकृति के पीछे नहीं चलना है। अपनी बेहोशी के पीछे नहीं चलना है। सिर्फ़ इसलिए कि कोई चीज़ शरीर सुझा रहा है, उसका पालन नहीं करना है। सिर्फ़ इसलिए कि कोई चीज़ समाज से और परंपरा से आ रही है, वो आपका कर्तव्य नहीं बन जाती। आपका कर्तव्य, आपका प्रेम है। प्रेम ही प्रथम कर्तव्य है।

मैं झिझक रहा हूँ कहते हुए कि प्रेम ही एकमात्र कर्तव्य है। तो आप “प्रथम” लिखो, प्रेम ही प्रथम कर्तव्य है। और वो कर्तव्य अगर पूरा हो रहा है, तो बाक़ी सब अपने आप हो जाता है।

श्रोत्र, जिव्हा, घ्राण, नेत्र।

“न च श्रोत्रजिव्हे, न च घ्राणनेत्रे।”

न ये हूँ, न इनका विषय हूँ। इनमें से किसी के साथ भी मेरा तादात्म्य नहीं है। जो कुछ भी प्रतीत हो सकता है वो मेरे लिए बहुत भारी नहीं हो सकता। जो कुछ भी अनुभव के क्षेत्र में आता है, वो मेरी आत्मा नहीं हो सकता। जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, अच्छी बात है, दिखाई दे रहा है, बढ़िया है। लेकिन ये सब कुछ अपने आप में एक अंत नहीं है। ये सब कुछ अपने आप में अधिक से अधिक साधन है, माध्यम है।

कुछ दिखाई दे रहा है। कहीं पर कोई गाड़ी खड़ी हुई है, गाड़ी अपने आप में अंत नहीं हो सकती। आप गाड़ी ख़रीदने जाते हैं; थोड़ा विचार करिएगा, होना तो ये चाहिए न कि हम सोचें कि हमारी असली आवश्यकता क्या है, और उसके हिसाब से हम गाड़ी का चयन करें। हमें पता होना चाहिए हमारी मंज़िल क्या है, उसके हिसाब से जीवन में गाड़ी आनी चाहिए। ऐसा ही होना चाहिए न? लेकिन उस पल को याद करिए, जब आप शोरूम में खड़े होते हैं और सामने एक चमचमाता नया मॉडल होता है। उस वक़्त मन पर क्या छाया होता है, ईमानदारी से बताइएगा, मॉडल या मंज़िल?

श्रोता: मॉडल।

आचार्य प्रशांत: यही समस्या है। मॉडल मंज़िल पर हावी हो जाता है, जबकि मंज़िल को निर्धारित करना चाहिए कि जीवन में मॉडल कौन-सा आएगा।

वो गाड़ी कुछ भी हो सकती है। वो गाड़ी जीवन के तमाम निर्णय हो सकते हैं; वो गाड़ी नौकरी हो सकती है; वो गाड़ी तमाम तरह के चुनाव हो सकते हैं; वो गाड़ी स्त्री-पुरुष हो सकती है। मुझे मंज़िल पता हो, तो मैं मॉडल चुनूँ न। मुझे अधिक से अधिक, मैं जहाँ रहता हूँ, वहाँ से दो किलोमीटर ही दूर जाना होता है, एक शहर से दूसरे शहर में कभी जाता ही नहीं, और मैं जाकर के गाड़ी चुन रहा हूँ लॉन्ग-डिस्टेंस क्रूज़र। क्यों? क्योंकि वो कैसी दिख रही है? आकर्षक दिख रही है। या कि लोगों ने बोल दिया कि ज़िंदगी सफल तभी है जब ये लॉन्ग-डिस्टेंस क्रूज़र तुम्हारे घर में आएगी।

मैं भूल ही गया मेरी मंज़िल क्या है। मैं भूल ही गया मैं कौन हूँ, मुझे चाहिए क्या। मुझ पर क्या हावी हो गया? मुझ पर क्या हावी हो गया? मॉडल हावी हो गया। मॉडल हावी न हो, जो आपके कान में बातें गई हैं, वे आप पर बहुत हावी न हों। उसके लिए कहा जा रहा है, “न च श्रोत्रजिव्हे।” श्रोत्र माने कान, जिव्हा माने?

श्रोता: जीभ।

आचार्य प्रशांत: और “घ्राणनेत्रे।” आँखो से वो दिखाई दे रहा है मॉडल वो बहुत बड़ी बात नहीं हो जानी चाहिए। ये नहीं कहा जा रहा कि आप गाड़ी ख़रीदिए ही मत। लेकिन पहले क्या आएगा? पहले मंज़िल आएगी। मंज़िल से तय होगा कि मॉडल कौन-सा घर आएगा।

फिर याद करिए, जब आप खड़े होते हैं किसी बहुत चकाचौंध-भरी, चमचमाती चीज़ के सामने विषय के समक्ष, तो मंज़िल उस वक़्त याद रह जाती है क्या? ये कितनी अजीब बात है कि जिसको जीवन में आना चाहिए था आपको मंज़िल की तरफ़ ले जाने के लिए, वही आपके जीवन में आकर आपको मंज़िल से विमुख कर देता है। मॉडल किसलिए है गाड़ी का? कि जीवन में आए और आपको मंज़िल की तरफ़ ले जाए। मॉडल इसलिए है न। लेकिन जब आप मॉडल के सामने खड़े होते हैं, वो क्षण होता है जब आपको मंज़िल बिल्कुल याद नहीं रह जाती।

तो आपको मंज़िल से ही किसने दूर कर दिया? मॉडल ने। जबकि मॉडल होना चाहिए था? मंज़िल की तरफ़ ले जाने के लिए। तो इसलिए मना करा जा रहा है। ये बात थोड़ी है कि नाक बंद कर लो, मुँह बंद कर लो, कान बंद कर लो। नाक, आँख, कान, सब बंद कर लोगे तो जो सामने गाड़ी खड़ी है, उसको चलाओगे भी कैसे।

इनको बंद करने की बात नहीं हो रही है। लोग सोचते हैं कि ये वैराग्य का सूत्र है। ये वैराग्य का सूत्र नहीं है। चेतना का सूत्र है, प्रेम का सूत्र है। निर्वाण षट्कम को वैराग्य से जोड़कर हम लोगों को शिव से दूर कर देते हैं। शिवत्व का तो अर्थ ही है, प्रेम। मंज़िल दिल में लिए, आँखों से मॉडल को देखता हूँ। क्या? फिर आँखें जो भी देखेंगी, ठीक है। मॉडल आँखों से दिखे, दिल में तो मंज़िल ही होनी चाहिए। उसी मंज़िल का नाम शिव है। समझ में आ रही है बात?

और फिर हम अपने आप को संसार से बहुत ज़्यादा संचालित होने देते हैं। बिल्कुल, एकदम ग़ुलामी ही करने लग जाते हैं। हमारी मान्यताएँ संसार से आने लग जाती हैं। जो कुछ भी भौतिक है, वो बिल्कुल हम पर हावी होने लग जाता है। अपना ही शरीर हम पर हावी हो जाता है। घर, द्वार, परिवार हम पर हावी हो जाते हैं। हम जिस क्षेत्र, समुदाय, जाति, धर्म इत्यादि के होते हैं, उसकी बातें हम पर हावी हो जाती हैं।

तो उसके लिए कह रहे हैं:

“न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु:।”

सब कुछ इसी में आ गया। पूरा भौतिक जगत इनमें समा जाता है। इसको बहुत क़ीमत मत दे देना। जो थोड़ा-सा समझ पा रहे हैं, वो ये भी देखेंगे कि जब आप इनको क़ीमत नहीं देते हो, तो ये सूत्र निडरता का बन जाता है।

प्रेम और निडरता एक ही बात होते हैं। ऐसी चीज़ को क़ीमत दोगे आप जो आपके नियंत्रण में नहीं है, तो हमेशा डरे हुए रहोगे कि नहीं। डर का इसके अलावा कोई कारण नहीं होता। ऐसी चीज़ को महत्त्व देना जो आपके नियंत्रण में है ही नहीं। आपके नियंत्रण में नहीं है, लेकिन आपका जीवन बन बैठी है, तो डरेंगे न। कुछ ऐसा जिस पर आपका कोई बस नहीं चलता, लेकिन वो चीज़ आपके जीवन पर छा बिल्कुल गई है, तो डरोगे न?

जैसे आपका हृदय ही किसी बाहरी ताक़त द्वारा संचालित हो रहा हो। हमेशा एक डर बना रहेगा न, “क्या पता कब मेरा दिल ही मुझसे छिन जाए, क्या पता कब उस व्यक्ति के इशारों पर मेरी धड़कन रुक जाए।”

वो बाहर वाला है, भाई।

तो बाहर की किसी भी चीज़ को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है। आज हमने शुरुआत करते हुए ही कहा, उल्लंघन, लाँघना; बाधाएँ, चुनौतियाँ, इनको पीछे छोड़ना, यही शिवत्व है।

जो शिवत्व है, वही कृष्णत्व भी है; और जो कृष्णत्व है, वही रामत्व भी है, कोई अंतर नहीं है उसमें। जब हम संतों के साथ होते हैं, तो गाते हैं, “राम निरंजन न्यारा रे।” जब हम गीता के साथ होते हैं, तो वहाँ श्री कृष्ण की वाणी होती है। आज महाशिवरात्रि है, हमारे साथ निर्वाण षट्कम है। पर सबके आप केंद्र में जाएँगे, तो बात तो एक ही मिलेगी। और उसी बात को कहते हैं, वेदान्त दर्शन। वेदान्त दर्शन वास्तव में प्रेम का दर्शन है।

वेदान्त का अर्थ ही है, प्रेम पहला रहेगा सदा। बुद्धि का बिल्कुल इस्तेमाल होगा, पूरा-पूरा इस्तेमाल होगा। लेकिन बुद्धि प्रेम से ऊपर की बात नहीं होती है। चित्त प्रेम से ऊपर की बात नहीं होता। वृत्तियाँ प्रेम से ऊपर की बात नहीं होतीं। कामनाएँ प्रेम से ऊपर की बात नहीं होतीं। और प्रेम तो कामना बिल्कुल भी नहीं होता है। किसी वस्तु की ओर इंद्रियगत आकर्षण है, तो क्या याद रखना है हमें? “न च श्रोत्रजिव्हे, न च घ्राणनेत्रे।”

तो कामना प्रेम नहीं होता। ये न हो जाए कि आप कहें कि जो चीज़ अच्छी लग रही है, वो तो मुझे चाहिए, क्योंकि यही तो बोला गया था कि बुद्धि पीछे रखो, प्रेम आगे रखो। तो अपनी पूरी बुद्धि पीछे रखकर के अपनी ज़िंदगी को मैं अब लुटाए दे रहा हूँ अपनी कामना के पीछे। ऐसा अर्थ तो नहीं लगाए ले रहे न?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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