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ग्रंथों में नारियों को सम्मान क्यों नहीं देते? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।।

हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक ३२

प्रश्नकर्ता: इसमें मेरे दो प्रश्न हैं। पहला तो यह कि आखिर हर ऋषि कहीं-न-कहीं स्त्री को ही निम्न कोटि में डाल करके बात करता है। दूसरा — कई बार आपने समझाया है कि यह मन की ही दो स्थितियों की बात है, अगर ऐसा भी है तो इस स्थिति में उपमा के तौर पर स्त्री को ही इतना नीचे के तल पर रखकर बात क्यों की जाती है? और अगर ऐसा कुछ है वास्तव में, तो स्त्री होने के नाते ध्यान रखने वाली चीज़ क्या है?

आचार्य प्रशांत: देखो, समझना पड़ेगा। जहाँ से कृष्ण बात कर रहे हैं, वहाँ से देखने पर तो जीव ही मिथ्या है, तो काहे की स्त्री और कौन सा पुरुष। जहाँ से कृष्ण देख रहे हैं, वहाँ से देखने पर तो जीव ही नहीं है, तो स्त्री कौन, पुरुष कौन। जिंदा कौन और मुर्दा कौन।

अर्जुन को कह रहे हैं कि ये जो ज़िंदा हैं, वो भी मुर्दा हैं और जो मुर्दा हैं, वो कभी ज़िंदा थे। वह बिल्कुल एकदम घबराया हुआ है कि कुछ है या नहीं है। मरे हुए जो हैं, वो कभी मरे नहीं, जो जिंदा है, वो पैदा हुए नहीं। वो तो जीव की ही सत्ता बताए दे रहे हैं कि मिथ्या है। अब उसमें क्या परेशान होना कि कौन स्त्री है, कौन पुरुष है।

लेकिन सुनने वाला कौन है? अर्जुन है। अब इन साहब पर ध्यान देते हैं। ये वो है जो पहले अध्याय में बता रहे थे कि देखिए, अगर हमने लड़ाई करी तो सब क्षत्रिय पुरुष मर जाएँगे और फिर हमारी औरतें खराब हो जाएँगी, वो इधर-उधर जा करके संबंध बनाएँगी, उससे वर्णसंकर पैदा होंगे। वो सब याद है?

तो सुनने वाला किस मानसिकता का है? सुनने वाला तो जाति, लिंग इन सब संस्कारों से घिरा हुआ है न? और देखो, वह समय ऐसा था जब अर्थव्यवस्था पूरी तरीके से बाहुबल पर चलती थी, आदमी द्वारा किए जा रहे श्रम पर चलती थी। मशीनें आविष्कृत हुई नहीं थीं और मशीनें जो हुई थीं, वो अपने बहुत ही आरंभिक स्तर पर थीं। किस तरह की मशीन थी? अब धनुष भी एक मशीन ही है, पर उस मशीन में ऊर्जा कहाँ से आ रही है? आदमी के बाज़ू से आ रही है।

तो उस समय जो मशीनें भी थीं, वो न तो हाइड्रोकार्बन से चल रही थीं, न सोलर पावर (सौर ऊर्जा) से चल रही थीं, न टाइडल वेव (ज्वारीय लहरों) से चल रही थीं। सब मशीन है, जो छोटी-मोटी थी, वो काहे से चल रही थी? वो पशुओं की बाज़ू से चल रही थी, तुमने बैल लगा दिए तो वो खेत जोत रही थी या फिर मनुष्य की बाज़ू से चल रही थी।

अब प्रकृति ने कुछ कर दिया है भाई, कि बाज़ू तो पुरुषों के ज़्यादा मजबूत होते हैं। उस समय की अर्थव्यवस्था, ज़ाहिर सी बात है, किनके हाथों में थी? पुरुषों के। अब आज अगर लड़ाई हो तो दागी जाएगी मिसाइल। अब मिसाइल बनाने में बाज़ू तो लगे नहीं है। मिसाइल बनाने में क्या लगा है? दिमाग। मिसाइल दागने के लिए भी क्या चाहिए? बाज़ू नहीं चाहिए। तो मिसाइल बनाने का काम भी स्त्रियाँ कर सकती हैं आज और मिसाइल लांच करने का काम भी कर सकती हैं स्त्रियाँ, कर सकती है न?

अभी पिक्चर देख कर आए होगे ‘मिशन मंगल’। उसमें आपने देखा होगा कि जो पूरी टीम ही थी, उसमें ज्यादातर महिलाएँ ही थीं। तो आज के समय में तीर क्या, रॉकेट भी लांच करना हो तो महिलाएँ पूरी तरह से सक्षम हैं। पर उस समय होता था गदा युद्ध। अब तुम भीम के सामने किसी स्त्री को खड़ा कर दो गदा दे करके, तो क्या होगा? तो क्या होगा, बोलो? कुछ नहीं होगा। भीम हँस-हँसकर लोटने लग जाएँगे।

उस समय जो पावर (शक्ति) आता था, वो जो एनर्जी (ऊर्जा) का स्रोत था, वो यह था (बाजुओं की तरफ इशारा करते हुए) 'द ह्यूमन मसल' (मानवीय माँसपेशियाँ)। और ‘द ह्यूमन मसल’ किसके पास ज़्यादा थी? पुरुषों के पास ज़्यादा थी। तो, भाई, सारी सत्ता पुरुषों ने हथिया रखी थी। उन्हीं सत्ता-धारियों में एक कौन है? अर्जुन भी। तो अर्जुन की निगाह में भी स्त्रिया कैसी हैं?

यह समय की बात है, अर्जुन को दोष नहीं दिया जा रहा, उस समय जो जितने भी लोग थे उन सब की दृष्टि में स्त्रियां थोड़े नीचे के ही तल की हुई न, क्योंकि ऊर्जा तो है ही नहीं ना उनके पास और पूरी अर्थव्यवस्था किस से चल रही थी, पूरी दुनिया ही किस से चल रही थी? ऊर्जा से।

आज भी जो बड़े-बड़े संग्राम हो रहे हैं, जो बड़ी लड़ाइयाँ चल रही हैं दुनिया में, वो किसके लिए हो रही हैं? एनर्जी के लिए। ये जो लगातार मिडिल-ईस्ट (मध्य-पूर्व) में कोहराम मचा रहता है, ये क्यों मचा रहता है? क्योंकि मिडिल-ईस्ट में क्या है? तेल है, ऊर्जा। उससे मशीन चलेगी, भाई, उससे यूरोप पूरा ठंड में गर्म रहेगा।

इराक ने कुवैत पर क़ब्ज़ा क्यों किया था? खाड़ी युद्ध हुआ ही क्यों था? कुवैत तो इतना सा है (छोटा सा), दो जिले बराबर। सद्दाम हुसैन को क्या पड़ी थी कुवैत पर आक्रमण करने की? कुवैत के पास क्या था? तेल। अमेरिका की सीरिया में इतनी रुचि क्यों है? आधी दुनिया पार करके सीरिया में अमेरिका क्यों घुसा रहता है? रूस क्यों घुसा रहता है, क्यों घुसा हुआ है? क्योंकि वहाँ पर ऊर्जा है, ऊर्जा। जहाँ कहीं ऊर्जा होती है, वहाँ सत्ता होती है। फिर समझो जहाँ ऊर्जा, वहीं पर सत्ता है। क्योंकि आदमी की सारी ताकत किस पर आधारित है? ऊर्जा पर आधारित है।

अब यह जो बात हो रही है जिस समय की बात हो रही है, फिर से याद करो कि ऊर्जा पाने का एकमात्र ज़रिया क्या था? आदमी की बाज़ू। औरतों की बाज़ू कमज़ोर होती थी, आज भी होती है। लेकिन आज सौभाग्य की बात यह है कि महिलाओं के लिए ऊर्जा बाजुओं से नहीं आती, मस्तिष्क से आती है। तो इसीलिए बहुत संभव है कि आज किसी बड़े देश की सेना में बड़ा पद किसी महिला के पास हो, पर तब नहीं संभव था। कोई महिला नहीं आती गदा युद्ध करने। हाँ, कुछ ऐसे विवरण मिलते हैं कि कुछ महिलाओं ने शस्त्र-विद्या सीखी और धनुष इत्यादि भी चलाए होंगे पर वो बीच-बीच के हैं।

अधिकाँश तब लड़ाई लड़ने वाले कौन थे? खेत जोतने वाले कौन थे? तो लो, उत्पादन भी सारा कौन कर रहे थे? और अर्थव्यवस्था सारी किनके हाथों में थी? पुरुषों के हाथों में, तो ज़ाहिर सी बात है कि वे स्त्रियों को कैसा समझते थे? नीचे का समझते थे।

तो उनकी अर्जुन से बात की जा रही है तो अर्जुन को कहा जा रहा है कि "अर्जुन, मेरी शरण में आकर सबको मुक्ति है, भले ही वह तेरी दुनिया में नीचा समझे जाने वाले लोग क्यों न हों। अर्जुन तेरी दुनिया में तू जाति के आधार पर कुछ लोगों को नीचा समझता है न? कृष्ण की शरण में आएँगे, उनको भी मुक्ति है। अर्जुन तेरी दुनिया में स्त्रियों को नीचा दर्जा दिया जाता है न? कृष्ण की शरण में आएँगी तो महिलाओं को भी बराबर की मुक्ति है।"

तो कृष्ण तो बराबरी का दर्जा दे रहे हैं। कृष्ण कह रहे हैं कि मेरे सामने चाहे ब्राह्मण आएँ, चाहे शुद्र आएँ, मैं तो सबको मुक्ति देता हूँ। भेद करने वाला कौन है? भेद करने वाली दुनिया है, भेद करने वाला संसार है; भेद करने वाले कृष्ण नहीं है। स्पष्ट हुआ? इसमें महिलाओं की कोई गलती नहीं है, यह बात समय की है। वह समय ही ऐसा था।

अब तुमने पूछा है कि आचार्य जी, महिलाओं में वास्तव में कोई खोट होती है तो बता ही दीजिए ताकि हम सतर्क हो जाएँ। वह जो खोट है, वह महिलाओं में विशेषकर नहीं है। वह महिलाओं में है और पुरुषों में भी बराबर की है। अगर सतर्क होना है तो दोनों को होना पड़ेगा, महिलाओं को पुरुषों को, दोनों को होना पड़ेगा। वो यही है कि शरीर के चलाए ज़रा कम चलो। अगर स्त्री ऐसी है कि शरीर के चलाए चलती है तो उसको भी सतर्क होना पड़ेगा और पुरुष ऐसा है जो शरीर के चलाए चलता है तो उसको भी सतर्क होना पड़ेगा। देह से थोड़ा बचकर रहो।

देखा ज़रूर ऐसा जाता है, दृष्टिगत जो परिणाम है, वो यही है, ये बताते हैं कि पुरुषों की सत्ता ने महिलाओं को कुछ ऐसा संस्कारित कर दिया है कि वो बहुत ज़्यादा देह-भावना में जीती हैं। इसमें कुछ काम तो प्रकृति का है और कुछ काम इस पुरुष-केंद्रित, पुरुष-संचालित समाज का है। स्त्रियों से कह दिया गया है कि तुम्हें हम स्थान, सम्मान और धन तुम्हारे रूप सौंदर्य के अनुपात में ही देंगे। और यह बात बहुत आरंभ से शुरू हो जाती है।

अभी एक पिक्चर देखी ‘छिछोरे’। आई.आई.टी बॉम्बे पर आधारित है। वहाँ की हॉस्टल लाइफ से संबंधित है। तो उसमें भी वही दिखा रहे हैं कि कैंपस में चालीस लड़कों पर एक लड़की है। खैर, ऐसा तो होता भी था। लेकिन वो जो लड़की है, उसका कहानी में कुल योगदान यही है कि वह सुंदर-सुंदर है और सब लड़के उसके पीछे पड़े हैं।

पूरी कहानी इस पर आधारित है कि एक हॉस्टल है जिसके लड़के एक चैंपियनशिप जीतना चाहते हैं। अब चैंपियनशिप जीतने में लड़की का कोई योगदान ही नहीं, योगदान छोड़ दो, लड़की की कोई रुचि भी नहीं। लड़कियों का जो पूरा हॉस्टल ही दिखाया गया है, उनकी कोई रुचि ही नहीं, लेकिन फिर भी लड़की का जो किरदार है, वह बड़ा केंद्रीय है क्योंकि वह सुंदर-सुंदर है।

तो पूरी कहानी में लड़कों को जो महत्व मिला है, वह इसीलिए मिला है क्योंकि वो जीत रहे हैं, वो खेल रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। लड़कों का महत्व इसलिए दिखाया कहानी में क्योंकि वे जीत रहे हैं, खेल रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं और लड़की का महत्व किस लिए है? क्योंकि वह सुंदर-सुंदर है। तो लड़की को संदेश क्या जा रहा है? कि बेटा, तू सुंदर-सुंदर जितनी ज़्यादा होगी न, तुझे उतनी जगह मिलेगी। तो लड़की कहती है मुझे उपलब्धि लेकर करना क्या है, मुझे सुंदर-सुंदर होने दो। मुझे देखो कहानी में भी जगह तभी मिली जब मैं सुंदर-सुंदर थी।

लड़के जो हैं, वो सब साधारण हैं, एक-आध तो घिनौने हैं दिखने में, लेकिन उनको फिर भी बड़ी केंद्रीय जगह मिली है। क्यों? क्योंकि वो एक चैंपियनशिप जीतने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन लड़कियों का हॉस्टल चैंपियनशिप में कहीं नज़र ही नहीं आ रहा है, कहीं है ही नहीं। हाँ, एक सीन (दृश्य) में ज़रूर आती है बिचारी, दुबली-पतली, वज़न उठाने की कोशिश करती है। उसको भी यही दिखाया गया है कि एक लड़का ऐसा बिल्कुल बेबस हो रहा है कि एक लड़की आकर उसको बेआबरू करे जा रही है। वहाँ भी उसको यही दिखाया गया कि लड़के को ताव ही तभी आया कि कहीं लड़की से न हार जाऊँ।

तो वहाँ भी लड़की का जो किरदार बीच में लाया गया, ज़रा-सा दो मिनट के लिए, बस इसी खातिर लाया गया कि लड़के के सामने वह एक मापदंड की तरह से बन सके। भाई, तू इतना दुबला-पतला, इतना मरियल हो गया क्या कि तू लड़की से हार जाए? छी! लड़की से। (आँख-मुँह सिकोड़ते हुए) तो फिर उसको ताव आ जाता है, कहता है, "लड़की से हारना पड़ेगा! हम तो लड़की से नहीं हारेंगे।" तो फिर वह आधा-मरा हुआ इंसान भी वज़न उठा जाता है क्योंकि उससे पहले लड़की वज़न उठा गई थी।

वैसे ही वह पिक्चर आगे बढ़ती है। उसमें अब ये सब एक ही कॉलेज से पढ़े हुए लोग हैं। इनका एक दुखद स्थिति में रियूनियन (पुनर्मिलन) होता है। इनमें से एक का जो बच्चा है, अस्पताल में भर्ती है, थोड़ा गंभीर हालत में है। तो ये पाँच-सात मिलते हैं दोबारा। वो जो लड़की है, उनमें से एक को ब्याह चुकी है, वह भी वहीं पर मौजूद है।

अब ये सब बैचमेट्स (सहपाठी) हैं और आई.आई.टी. के बैचमेट हैं, और पिक्चर क्या दिखा रही है? कि ये छः-सात जो लड़के हैं, ये बैठे हैं और यह लड़की है जो इनकी बैचमेट ही है, वह उनके लिए खाना बना रही है। खाना बना रही है और कह रही है, * "गाइस, डिनर इज़ रेडी" । ये सब बैठ करके कैंपस की पुरानी यादों की चर्चा कर रहे हैं और इन्हीं की * बैचमेट क्या कर रही है? इनके लिए खाना बना रही है।

यह बात हमने महिलाओं के भीतर बहुत गहरे से बसा दी है कि देखो, तुम्हारी उपयोगिता, तुम्हारा महत्व, तुम्हारा सम्मान तभी है जब या तो तुम सुंदर-सुंदर हो जाओ या देह वाले बाकी सब काम करो, खाना बनाना, बच्चे पैदा करना इत्यादि-इत्यादि। स्त्रियों ने भी इस बात को बहुत हद तक आत्मसात कर लिया है। यह बड़ी दुर्घटना हुई है महिलाओं के साथ कि पुरुषों ने उनको जो शिक्षा दी, उसको उन्होंने अपने भीतर उतार लिया। पुरुषों ने उनसे कह दिया कि तुम्हारी सबसे बड़ी अमानत तुम्हारा शरीर है। स्त्रियों ने कहा, “हाँ,” और वो लग गईं अपना शरीर ही साफ़ करने में, कि चमकाओ रे, चमकाओ।

उनसे पूछो यह तुम्हें किसने सिखाया कि तुम्हारे सबसे बड़ी संपत्ति शरीर है तुम्हारा, उनको याद ही नहीं आएगा कि यह बात उनको पुरुषों ने ही समझायी। क्यों समझायी? क्योंकि स्त्रियों का शरीर जितना चमकीला होगा, पुरुषों की कामवासना को पूरा करने में उतना ही सहायक होगा — इस बात के प्रति सतर्क रहो।

कुछ तो प्रकृति का काम है। स्त्री चूँकि गर्भ रखती है तो प्रकृति ने ही उसे शरीर के प्रति बड़ा संवेदनशील बना दिया है। वह बार-बार अपने शरीर को देखती रहती है क्योंकि उसको एक बहुत ही महीन काम करना है, डेलिकेट काम। उस काम में अगर ज़रा भी गड़बड़ हो गई तो बच्चा तो मरेगा ही, माँ भी मर सकती है, इंफेक्शन हो सकता है, कुछ भी हो सकता है। तो स्त्री बड़ी सजग रहती है।

तुम देखोगे कि लड़के तीन-तीन, चार-चार दिन, हफ्ता भर नहीं नहातेे और लड़की आमतौर पर ऐसा नहीं करती। लड़के घूम रहे होंगे एकदम गंधाते हुए, कतई भयानक दुर्गंध उठ रही होगी। लड़कियों से ज़रा कम उठती है। यह बात उनमें प्रकृति ने ही डाल रखी है कि " इंफेक्शन से बचना, खेल सारा बैक्टीरिया का है। नहाओगे नहीं तो बैक्टीरिया घुस जाएगा।"

कुछ तो प्रकृति ने तुमको देह-केंद्रित बना दिया और बाकी काम किसने कर दिया? पुरुषों ने कर दिया। "धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाए।" वो बोली, "ठीक, धूप में नहीं निकलेंगे। हम तो रूप की रानी हैं।" धूप में नहीं निकलेगी, मेहनत नहीं करेगी तो घर में क्या गुड़िया बनकर बैठेगी। बाहर निकल, जमीन का स्वाद चख, धूल खा, पत्थर फांक। “नहीं, जी, *आई एम द डॉल ऑफ द हाउस*” (मैं तो घर की गुड़िया हूँ)। तो बन जाओ *डॉल ऑफ द हाउस*।

और महिलाएँ सोचती हैं कि इसमें बड़ा सम्मान है, बड़ा प्रेम है कि हम तो जी घर में रहते हैं, ’आई एम द क्वीन ऑफ द हाउस’ (मैं तो घर की रानी हूँ)। तुम समझ ही नहीं रही हो कि तुम क्वीन ऑफ द हाउस नहीं हो, तुम जो हो घर में उसके लिए भाषा में बड़ा एक बदबूदार शब्द है।

यह कभी मत सोचना कि धर्म ने या अवतारों ने, गुरुओं ने, ऋषियों ने, मुनियों ने, महिलाओं के साथ भेदभाव या अन्याय किया है। मैं तो बार-बार कहा करता हूँ कि वो जब आदमी को आदमी जैसा नहीं देखते थे तो औरतों को औरत क्या देखेंगे।

महात्मा बुद्ध के साथ जो कहानी जुड़ी हुई है, खूब कही जाती है। तुमने भी सुनी होगी। मैं ही एक-दो बार बता चुका हूँ कि बैठे हुए हैं और कुछ चोर थे, या पता नहीं कौन। वो एक लड़की को ले आए थे, वैश्या को या किसी को। उसके साथ अपना वो शारीरिक संबंध बना रहे थे जंगल में। वो वहाँ से जान छुड़ाकर भगी, नंगी-पुंगी। तो बुद्ध बैठे थे, उनके सामने से करीब-करीब नग्न हालत में भाग गई वो।

पीछे-पीछे वो चोर वग़ैरह आए। उन्होंने बुद्ध को पकड़ा, झिंझोड़ा और बोले, "यहाँ से कोई लड़की गई, तूने देखा क्या?” वो बोले कि ध्यान नहीं दिया। तो (चोर) बोले, "बकवास करता है, बूढ़ा थोड़े ही है।"—यह सब मैं अपनी ओर से जोड़ रहा हूँ — "तुझे दिखा नहीं? सुंदर लड़की, वो भी नंगी लड़की, अभी तेरे सामने से भी गुजरी और तू कह रहा है कि देखा नहीं।" वो (बुद्ध) कह रहे हैं, “हमें अभी आदमी-औरत नहीं समझ में आता है।”

अब ऐसे बुद्ध पर तुम इल्ज़ाम लगाओ कि उन्होंने स्त्रियों के साथ भेदभाव करा तो यह नाइंसाफी है। उन्होंने नहीं करा। हाँ, समाज ने करा हो; यह जो पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था है, इसने करा हो, पंडितों-पुरोहितों ने करा हो, वह संभव है। कृष्णों ने नहीं करा है।

और भी कुछ पूछा था? हाँ, तुमने पूछा था कि ये जितनी भी बेवकूफ़ी है, इसका प्रतीक स्त्री को ही क्यों बनाया जाता है? नहीं, ऐसा नहीं है कि स्त्रियों को ही बनाया जाता है। माया को स्त्रीलिंग में संबोधित करते हैं, ठीक है, पर इतने सारे और विकार भी होते हैं सबको थोड़े ही न स्त्रीलिंग में ही संबोधित करते हैं।

तुम कहती हो क्या, ‘आज मैंने बड़ी पाप करी’? पाप स्त्रीलिंग है? फिर? ऐसा थोड़ी है कि जितनी भी घटिया चीज़ें हैं, सबको स्त्रीलिंग में ही संबोधित किया जा रहा है। तुम पर विकार ‘चढ़ी हुई’ है? हाँ, वृत्ति को कह देते हैं स्त्रीलिंग में और विकार को कह देते हैं पुल्लिंग में। ऐसा नहीं है कि जितनी भी घटिया चीज़ें हैं, उन सभी को चुन-चुनकर स्त्रियों से ही संबंधित कर दी गई हैं या स्त्रीलिंग में ही कही जाती हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

भाषा पर भी आरोप मत लगाओ कि भाषा में स्त्रियों को ही निशाना बना रखा है। मामला करीब-करीब बराबर का है। ऐसा नहीं है। हमारी भाषा भी तो अनूठी है। हर चीज़ को एक लिंग से जोड़ देती है। यह काम अंग्रेजी में होता नहीं, तो वहाँ यह सवाल उठता नहीं, पर भारतीय भाषाओं में, ज़्यादातर भारतीय भाषाओं में लिंग लगा दिया जाता है। पर उसमें भी यह बात नहीं है। तुम भी थोड़ी न कहोगे कि ‘तेरे हाथ में मल लगी है’? अब मल क्या होता है? स्त्रीलिंग होता है मल? मल स्त्रीलिंग तो नहीं होता न। फिर?

इसीलिए बार-बार कहता हूँ कि लड़कियों के लिए, महिलाओं के लिए तो परम आवश्यक है कि उनके हाथ मजबूत रहें। उन्हें विज्ञान की जानकारी हो, अर्थव्यवस्था की जानकारी हो, दुनिया में जो घटनाएँ चल रही हैं, हाल-चाल चल रहा है, उनका उन्हें पता हो और उनका अपना बैंक खाता हो, जिसमें उनके अपने निजी पैसे हों। व्यक्तिगत (खाता), जॉइंट भी नहीं कि साझा है। यह साझेदारी न जन्म में चलती है, न मौत में चलती है तो बैंक में काहे को चलती है?

एक देवी जी आईं और बोलीं, "पैसा नहीं है।" मैंने कहा कि आपका कुछ अपना खाता-वाता नहीं? बोलीं, "है।" "क्या उसमें कुछ नहीं?" बोलीं, "बहुत है।" "फिर?" "नहीं, एटीएम एक ही है, वह उनके पास रहता है।" यह इनका जॉइंट अकाउंट है। (हँसते हुए)

अपना खाता रखो और ए.टी.एम. का पासवर्ड पतिदेव को तो बिल्कुल मत बताना और न डुप्लीकेट कार्ड बनवाना, और न उसके ए.टी.एम. का पासवर्ड तुम्हें पता होना चाहिए। न यह करना कि अपने क्रेडिट कार्ड से एक और बनवा दो न मेरे लिए, कुछ नहीं।

प्रेम कितना भी हो, आर्थिक आत्मनिर्भरता बहुत ज़रूरी है। बल्कि प्रेम भी तभी हो सकता है जब दोनों पक्ष सबल हों। यह मत कर देना कि अब प्रेम बहुत हो गया है तो अब हम अपनी व्यक्तिगत सत्ता क्या रखें, प्रेम का तो मतलब ही है न समर्पण। तो आप जब तन-मन श्रीपति को ही समर्पित कर ही दिया है तो धन भी अपना क्या रखें। आओ, परमेश्वर! धन भी तुम्हारा ही है।

प्र२: इसी में, जब चर्चा चल रही है, इसी में एक सवाल है। भगवान बुद्ध से जब उनकी मौसी मिलीं तब उन्होंने कहा कि स्त्रियों को वो संघ में स्थान नहीं दे सकते। फिर मजबूरन आनन्द के कहने पर उन्हें महिलाओं को भी संघ में स्थान देना पड़ा। तो फिर उन्होंने कहा कि मेरा धर्म पाँच हज़ार वर्ष चलता, लेकिन अब केवल पाँच सौ वर्ष चलेगा।

आचार्य: समय ऐसा था। स्त्रियों में नहीं खोट हो गई, समय की बात है। वह समय ऐसा था। भाई समझ गए इस बात को न। बुद्ध भी तो पाँचवी-छठी शताब्दी ई.पू. के ही हैं।

जिसके हाथ में ताकत नहीं, वह बस उपभोग की वस्तु होगा।

आदमी कहाँ से निकला है, भूलना नहीं है, कहाँ से निकला है? जंगल से। और जंगल में प्रेम नहीं होता। जंगल में शिकारी होता है और शिकार होता है, या जंगल में हीर-रांझा होता है? होता है कभी? सुना है शेर और हिरणी में, 'तू मेरा चाँद, मैं तेरी चाँदनी'? सुना है क्या? वह शेर-शेरनी में नहीं होता, शेर और हिरणी में क्या होगा? आदमी कहाँ से आया है, दोहराओ? जंगल से। और जंगल में क्या होता है? कोई शिकार, कोई शिकारी। जो ऊँचा है, वो हो जाएगा (शिकारी), और काहे में ऊँचा, बोध में ऊँचा? बाहुबल में ऊँचा। जो बाहुबल में ऊँचा, वो क्या हो जाएगा? शिकारी। जो बाहुबल में नीचे, वो क्या हो जाएगा? शिकार।

आदमी-औरत भी जंगल से ही निकल कर आए हैं, तो ज़ाहिर सी बात है कि आदमी के भीतर का जानवर औरत को कैसे देखेगा? शिकार की तरह ही तो देखेगा। वह यही देखेगा कि मुझसे नीचे की है, इसमें ताकत कम है। इसमें और भी ताकत कम हो जाती है गर्भावस्था में।

और वह समय ऐसा था कि औरत हर समय गर्भवती रहती थी। एक-एक औरत अपने जीवनकाल में पाँच बच्चे, दस बच्चे पैदा कर रही है और उन बच्चों में भी आधे मर रहे हैं। आधे तो मर ही रहे हैं। तो अगर उसका औसतन चालीस-पचास वर्ष का जीवनकाल है तो उस जीवनकाल में आधे समय तो वह गर्भ से ही है। जब वह गर्भ से ही है तो उसकी हालत कैसी है? तब और कमज़ोर हो गई। ये कुछ नहीं कर सकती, हिलना-डुलना भी कम हो जाए, ऐसी हालत हो गई। अब वह पूरी तरह से किसकी मेहरबानी पर निर्भर है? पुरुष की।

अब पुरुष खाना दे दे तो ठीक है। पुरुष शिकार करके लाया है जंगल जा करके, इसको दे दे तो बचेगी, नहीं तो यह खुद तो शिकार कर नहीं सकती। गर्भवती स्त्री क्या खुद भागेगी जंगल में शिकार करने? तो इसीलिए स्त्री उस समय एक निचला दर्जा रखती थी। निचला दर्जा रखती थी, नतीजा शिक्षित भी नहीं थी, सबल भी नहीं थी, कुछ नहीं। अब न शिक्षा है, न बल है, तो फिर मन भी एकदम दुर्दशा ग्रस्त।

बुद्ध ने यह सामाजिक स्थिति देखी। उनको साफ़ दिखाई दिया कि स्त्रियों की ऐसी हालत ही नहीं है कि इनको सीधे-सीधे बुद्धत्व में प्रवेश कराया जाए। तो उन्होंने कहा कि अभी रुको, अभी नहीं समय है। लेकिन फिर उनकी शिक्षा का आकर्षण कुछ ऐसा था कि महिलाएँ खुद आने लग गईं, बोलीं, “नहीं, हमें भी दीक्षित कीजिए, हमें भी संघ में लीजिए।”

बुद्ध बहुत दिनों तक तो मना करते रहे, कहते रहे, "आप जाइए, आप चूल्हा-चौका देखिए। घर संभालिए। आप यहाँ मत आइए।" उसमें याद रखना, महिलाओं की गलती कम है। जो बुद्ध के भिक्षु थे, उनकी प्रवृत्ति ज़्यादा है, क्योंकि आदमी ताज़ा-ताज़ा कहाँ से निकला था? जंगल से और उसकी आदत थी महिलाओं को किस तरह से देखने की? शिकार के तौर पर देखने की।

अब तुमने अगर चार जवान लड़कियाँ संघ में रख ली तो क्या होगा? बुद्ध के ये जो भिक्षु है, सब मुंडे, ये आपस में ही लड़ मरेंगे। तो बुद्ध कहते थे, “रहने दो, भाई। तुम लोग अभी बाहर ही रहो।” पर बहुत सारी सब इकट्ठा हो गईं, बोलीं, “नहीं।” बुद्ध भी फिर असहाय हो गए और बोले, “आओ, अगर तुम इतनी ज़िद कर रहे हो।”

तो उनके लिए फिर एक अलग शाखा बनाई कि तुम लोग यहाँ पर रहो, उनके लिए कुछ दूसरे नियम-क़ायदे भी बनाए, वह सब करा कि तुम्हारी इस तरीके से व्यवस्था चलेगी। लेकिन फिर भी उन्होंने देखा होगा कि जबसे भिक्षुणियाँ आई हैं, तब से मेरे भिक्षु बिल्कुल धर्म-ईमान एकदम छोड़ चुके हैं। तो उन्होंने फिर एकदम सिर पर हाथ रखकर कहा होगा कि मेरा धर्म जो पाँच हज़ार साल चलता, अब वह पाँच सौ साल ही चलेगा।

यह बात उन्होंने महिलाओं से त्रस्त हो करके नहीं कही है, यह बात उन्होंने अपनी भिक्षुओं पर लानत भेजते हुए कही है, कि तुम ऐसे बेईमान निकले कि जहाँ तुमने महिलाएँ देखी नहीं, वहाँ तुम फिसले। तुम्हारी सब साधना, तुम्हारा सब अभी तक का शिक्षा-दीक्षा, बुद्धत्व, सब बेकार ही है।

ऐसे उनकी बात सही भी निकली। बौद्ध धर्म पाँच सौ साल तो नहीं, हज़ार साल चला। बुद्ध के हजार-बारह सौ साल बाद आते हैं शंकराचार्य और बुद्ध का धर्म भारत से बिल्कुल साफ़ हो जाता है। तो उन्होंने भविष्यवाणी तो बिल्कुल ठीक ही करी थी, लेकिन इसमें दोष क्या महिलाओं का था? इसमें दोष उस जंगल का है जहाँ से महिला और पुरुष दोनों निकलकर आए हैं।

हमारे शरीर में वह जंगल घुसा हुआ है। आदमी औरत को देखता है तो वह सारा अध्यात्म भूल जाता है। यह बात बुद्ध को पता थी। बोले, “मैंने इनको दी होगी कितनी शिक्षा, बड़ी ट्रेनिंग कराई है इनकी, पर इनको जहाँ कोई मिली ढंग की भिक्षुणी, तहाँ ये भिक्षुणी को लेकर भागेगा आश्रम से, ये नहीं ठहरने वाला।”

जापान में एक बहुत प्रतिभाशाली भिक्षुणी हुई बौद्ध धर्म की ही। उस बेचारी का दुर्भाग्य कि वह दिखने में बहुत सुंदर थी। तो वह जिस भी गुरु के पास जाए, गुरु उसको लेने से मना कर दे, कहें कि मेरे संघ में नहीं, माफ़ कर। तू आई नहीं अंदर, क्या उपद्रव मचेगा। अंततः कहानी यह कहती है कि उसने अपने सारे बाल कटवा डाले और एक गर्म सलाख लेकर लोहे से अपना पूरा मुँह दाग डाला। फिर उसको प्रवेश मिला। अब बताओ इसमें गलती महिला की है? वह तो उत्सुक है, सीखना चाहती है, जानना चाहती है, पर आदमी की जंगली नज़र। आदमी ने अपनी वह नज़र स्त्री में भी आरोपित कर दी है, प्रविष्ट करा दी है। स्त्री भी अब अपने को पुरुष की नज़र से देखती है। यह बड़े-से-बड़ी दुर्घटना हुई है स्त्रियों के साथ।

स्त्री जब अपने-आपको आईने में देखती है — सब स्त्रियों की बात नहीं कर रहा पर बहुत सी ऐसी हैं — वो जो अपने-आपको आईने में देखती हैं तो ऐसे देखती हैं जैसे मैं उनको कैसी दिखूँगी। वह यह नहीं देखती कि मैं कैसी दिख रही हूँ, वह यह देखती है कि मैं उनको कैसी दिखूँगी। यह काम पुरुष भी करते हैं कि मैं उसको कैसा दिखूँगा। जो भी यह काम कर रहा है, वही समझ ले कि उसने अपने साथ बड़ी गड़बड़ कर ली।

अब आपने जो प्रश्न पूछा, उस प्रश्न का एक बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम जानते हैं क्या है? जैसे आप कह रहे हैं न कि बुद्ध ने भी तो औरतों को अपने संघ में घुसने से मना करा था, वैसे ही आज की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, उनके मन में भी यह भावना बैठ गई है कि जो पुराने जितने हुए हैं, चाहे कृष्ण, चाहे बुद्ध, चाहे कबीर, इन सबने लड़कियों के साथ नाइंसाफ़ी करी है। वो कबीर साहब के भी दोहे उठाती हैं जिसमें उन्होंने नारी के बारे में, स्त्री के बारे में कुछ कहा है। कहती हैं, “ये सब तो मिसोजिनिस्ट (नारी विरोधी) थे। ये भी नारी विरोधी थे, तो हम नहीं मानते। हम कबीर को भी नहीं मानते।”

आजकल की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, लिबरल (उदारवादी), वो पुराने धर्म को संपूर्णता में अस्वीकार कर रही हैं। वो बोलती हैं कि धर्म का मतलब ही है नारी शोषण। पूरा धर्म ही स्त्री विरोधी है। वो कहती हैं, राम? राम ने सीता के साथ नाइंसाफ़ करी। कृष्ण ने भी यही करा। सब संतो ने भी यही करा। बुद्ध ने भी यही करा, महावीर ने भी यही करा। जीसस ने भी बोला हुआ है कि औरत के लिए तो संभव ही नहीं है लिबरेशन (मुक्ति)।

तो कहती हैं, “ये सब-के-सब कहने को अवतार, पैगंबर थे, लेकिन थे ये सब पुरुष-सत्ता के प्रतिनिधि ही। तो हम धर्म को ही पूरी तरीके से अस्वीकार कर देते हैं।” अब यह बड़ी गड़बड़ बात हो गई। जिस धर्म को महिलाएँ दोष दे रही हैं, आजकल की आधुनिक पढ़ी-लिखी महिलाएँ, वह धर्म अकेला ज़रिया है आदमी की मुक्ति का। तुमने अगर धर्म को ही कचरे के डब्बे में डाल दिया तो अब तुम्हारे लिए क्या आशा बचेगी?

इसलिए मैं बहुत ज़ोर देकर समझा रहा हूँ। यह मत समझो कि धर्म ने स्त्रियों के साथ भेदभाव करा है। नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, धर्म के केंद्र पर जो राम और कृष्ण और जीसस बैठे हैं, उन्होंने अपनी ओर से कभी भेदभाव नहीं करा। यह भेदभाव उस समाज ने करा है जो पुरातन था, जो कृषि आधारित था, जो बाहुबल आधारित था।

तो यह मत कर देना कि तुम इन सब बातों से प्रभावित होकर कि नहीं, ये संत-वंत तो सब एंटी-वीमेन (नारी विरोधी) थे, धर्म को ही त्याग दो। बहुत लड़कियाँ ऐसा ही कर रही हैं, “हमें रिलीजन (धर्म) से कोई लेना-देना ही नहीं, रिलीजन मतलब ही एक्सप्लॉयटेशन ऑफ वीमेन (महिलाओं का शोषण)।” नहीं, ऐसा नहीं है।

प्र३: अगर ऐसा नहीं है तो फिर समानता के समर्थन में एक वक्तव्य भी देखने को क्यों नहीं मिलता?

आचार्य: आत्मा। पूरा अध्यात्म तुम्हारी किस असलियत की ओर बार-बार इशारा कर रहा है? आत्मा। वो यही तो बता रहा है कि स्त्री तो तुम हो ही नहीं और पुरुष तो तुम हो ही नहीं। तो क्या हो? आत्मा। समानता हो गई कि नहीं? इससे बड़ी क्या समानता चाहिए, स्त्री न स्त्री है और पुरुष न पुरुष है। दोनों की असलियत है आत्मा। लो हो गई समानता।

यह तो समानता भी नहीं है, यह एकता है। यह भी नहीं कहा जा रहा है कि मैन इज़ इक्वल टू विमेन (पुरुष और स्त्री बराबर हैं), वो और आगे की बात कह रहे हैं, वो कह रहे हैं, ’मैन इस वुमैन एंड वूमेन इज मैन एंड बोथ आर फॉल्स’ (पुरुष स्त्री है, स्त्री पुरुष है और दोनों ही मिथ्या हैं)।

आत्मा को भी स्त्रीलिंग में ही संबोधित करते हैं। भूल जाते हैं बिलकुल ही। यह तो याद रहा कि माया को कहते हैं कि माया बड़ी बहुरूपिणी है, पर आत्मा को भी तो स्त्रीलिंग से ही संबोधित किया जाता है।

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