
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न न एस्ट्रोलॉजी के ऊपर है। आजकल हमारी निर्भरता एस्ट्रोलॉजी पर बढ़ती जा रही है। बहुत सारे न्यू एप्स भी आ गए हैं एस्ट्रोलॉजी पर। टेक्नोलॉजी के जरिए लोगों तक इसका प्रचार किया जा रहा है। और हम लोग अपने जीवन में जो भी गलत हो रहा है, उसको भाग्य से जोड़ते हैं। तो ये कितना सही है। एस्ट्रोलॉजी को और ज़्यादा बढ़ावा मिलना, लोगों का इस पर निर्भर होना और इसके लिए जिज्ञासा और विश्वास पैदा होना?
आचार्य प्रशांत: सही या गलत तो इससे तय होता है न कि वो चीज़ क्या है। इंसान का स्वभाव है जानना, तो जहाँ कहीं भी जिज्ञासा हो, जानने की इच्छा हो, तार्किकता हो, वैज्ञानिकता हो, सच्चाई और तथ्यों के लिए सम्मान हो, वो तो अच्छा ही होता है। उसमें तो कभी कुछ बुरा नहीं हो सकता। और इसके विपरीत, जहाँ ख़ुद को ही झाँसा देने की कोशिश हो और अनपरखी मान्यताएँ हों, वहाँ कुछ अच्छा नहीं हो सकता। तो इसी से सब तय हो जाता है।
देखिए, ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, सेलेस्टियल बॉडीज़, ग्रह, नक्षत्र, चाँद, सूरज, तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न इसका कोई प्रमाण है। ठीक है? लेकिन ऐसी बातें करके मनोवैज्ञानिक रूप से हमें एक सांत्वना मिल जाती है। पहला ये कि मेरी ज़िंदगी में जो हो रहा है, उसका ज़िम्मेदार मैं नहीं हूँ, भाग्य है। मैं क्या करूँ? सूरज, चाँद, नक्षत्र की स्थिति ही मेरी ऐसी चल रही है कि मेरे साथ जो होगा, उल्टा-पुल्टा ही होगा। तो अपने दुख या अपने बंधन का ज़िम्मेदार मैं नहीं हूँ। तो ज़िम्मेदारी से बचने में मदद मिल जाती है, आदमी इरिस्पॉन्सिबल रह पाता है।
और दूसरा, जो भीतर सदा डर बैठा होता है कि आगे क्या होगा, तो एक तरह ये सांत्वना मिल जाती है ख़ुद को कि आगे क्या होने वाला है, मैं ये जान सकता हूँ और नियंत्रित कर सकता हूँ। अपनी सुविधा, अपने स्वार्थ, अपनी कामना के अनुसार मैं फ़्यूचर को जान भी सकता हूँ और कुछ-कुछ विधियाँ, उपाय, रिचुअल्स करके मैं उनको नियंत्रित भी कर सकता हूँ। तो कुल मिलाकर, इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है, इरिस्पॉन्सिबिलिटी एंड इनसिक्योरिटी।
इरिस्पॉन्सिबिलिटी माने अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व किस पर डाल देना? भाग्य पर डाल देना; चाँद, तारों पर डाल देना; ग्रहों की स्तिथियों पर डाल देना। मैं थोड़े ही असफल हूँ, मुझे तो असफल किया जा रहा है क्योंकि इस वक़्त मेरी जो है ग्रह, नक्षत्र, दशा ऐसे चल रहे हैं कि मैं क्या करूँ। और दूसरा डर जब बहुत है भविष्य को लेकर, तो अपने आप को ये सांत्वना दे लेना कि चलो, भविष्य को जाना वग़ैरह जा सकता है। मनोवैज्ञानिक कारणवश, और कुछ नहीं है। इतना ही है।
ये बातें मैं आपसे बहुत बार कर चुका हूँ। ज्योतिष पर, एस्ट्रोलॉजी पर मैं आपसे बहुत बार बातें कर चुका हूँ। आप कई बार पूछेंगे तो भी मैं बस ये बता सकता हूँ कि कौन सी भीतर चीज़ होती है जो इस प्रकार की सांत्वनाओं की माँग करती है। भीतर कौन वो बैठा है डरा हुआ, जिसको इस तरीके के सहारे चाहिए होते हैं। भले ही वो झूठा सहारा हो, पर हम कहते हैं कि हमें सहारा दे दो। मैं आपको यही बता सकता हूँ।
आप अगर समझना चाहते हैं कि उससे नुकसान क्या होता है; आपने पूछा न सही क्या है, गलत क्या है; सही-गलत के आगे हानि-लाभ भी आपको देखना है अगर, तो उसका एक तरीका है जो मुझे सूझ रहा है। इसकी तुलना न एस्ट्रोलॉजी की, एस्ट्रोनॉमी से कर लीजिए, तो पता चलेगा कि हानि-लाभ कितना है। ज्योतिष शास्त्र और खगोल विज्ञान, एस्ट्रोनॉमी।
तो बात होगी सन् 1610 के आसपास की। ठीक है? मुगल बादशाह जहाँगीर के दरबार में अंग्रेज़ दूत पहुँचते हैं, नए-नए। अंग्रेज़ों ने भारत में आना अभी शुरू ही किया है। तो ये नए दूत पहुँचते हैं और कह रहे हैं कि, “हम इंग्लैंड के बादशाह आपको सलाम लेकर आए हैं और हम चाहते हैं कि हमें भारत में व्यापार करने की अनुमति मिले। तो इंग्लैंड के बादशाह की ओर से हम आपके लिए कुछ तोहफे भी लेकर आए हैं।” तो उन्होंने जो तोहफे थे, वो पेश किए जहाँगीर के सामने। उन तोहफों में एक जो उभरती हुई ब्रिटिश मशीनरी थी, उससे तैयार किया गया एक ऊनी शॉल जैसा था, कुछ और चीज़ें थीं, और साथ में एक घड़ी थी; मैकेनिकल क्लॉक। क्या थी? घड़ी, मैकेनिकल क्लॉक।
तो जहाँगीर ने वो सब स्वीकार कर लिया और ऐज़ अ रिटर्न गिफ्ट कि, “ठीक है, आपने हमें ये भिजवाया, आप जाकर अपने राजा को, इंग्लैंड के राजा को आप ये सब चीज़ें दीजिएगा।” तो जहाँगीर ने बहुत बड़े-बड़े सोने के बर्तन, हीरे-जवाहरात और ये सब चीज़ें उनको दी कि, “ठीक है, अब आप उनको ये हमारी ओर से दीजिएगा।”
इसके बाद, ये सब जब दूत चले गए दरबार से, तो जहाँगीर ने पूछा, “ये इंग्लैंड का जो बादशाह है, ये है भी कोई बड़ा बादशाह? जो इंग्लैंड का बादशाह है, ये कोई बड़ा बादशाह है भी?” अपने दरबारियों से पूछा। बताओ, क्यों पूछा? क्योंकि वहाँ से जो चीज़ें आई थीं, वो साइंटिफिक सोफिस्टिकेशन रखती थीं कुछ हद तक। सोना, चाँदी नहीं भिजवाया गया था। वहाँ से सोना, चाँदी नहीं भिजवाया गया। जो सबसे साइंटिफिकली सिग्निफिकेंट चीज़ भिजवाई गई थी, वो थी क्रोनोमीटर, घड़ी।
हम आ रहे हैं एस्ट्रोनॉमी पर आ रहे हैं; रुक जाओ, परेशान मत हो। अच्छा, तो बहुत लगा जहाँगीर को भी और दरबारियों को भी, ये तो बढ़िया चीज़ है। भारत में भी घड़ियाँ होती थीं, पर वो उस तरह की होती थीं। तो जो सन डायल होते हैं न, या जो पानी वाली घड़ी होती है, मैकेनिकल इंस्ट्रूमेंट नहीं था कोई भारत में। तो बड़ा अच्छा लगा कि इन्होंने तो ये बना दिया। इस समय दिखाती है, टाइम दिखाती है। पर फिर भी कहा कि, “ये तो चीज़ छोटी है न। असली चीज़ क्या होते हैं? अरे हाथी, घोड़े, सोना, चाँदी, इस तरह की चीज़ें ये भेजी होती।”
तो शालीनता के नाते, जहाँगीर ने सब स्वीकार कर लिया। लेकिन उसके मन में ये रह गया कि इंग्लैंड लगता है कोई दाम-वम नहीं है बहुत ज़्यादा। देखो, क्या भिजवाई है? छोटी सी घड़ी भिजवाई है, इसमें क्या होता है?
वो छोटी सी घड़ी थी जिसने हिंदुस्तान फतह कर लिया। समझते हैं बात क्या है। इंग्लैंड जो है न, वो आइलैंड है। ब्रिटिश आइल्स हैं वो सारे, आइलैंड है। वो पानी से घिरे हुए हैं चारों ओर से। उन्हें जो कुछ भी करना है, उन्हें समुद्र पर ही करना है। रॉयल नेवी का आपने सुना होगा, बहुत बड़ी होती है। रॉयल आर्मी जो है, वो बहुत छोटी होती है। जो ब्रिटिश एक्सपिडिशनरी जो फोर्स है, वो सेकंड वर्ल्ड वॉर में भी इतनी सी थी उनकी लेकिन नेवी बड़ी होती है। संसाधन ब्रिटेन के पास बहुत कम हैं। उनके पास अपनी जगह ही बहुत छोटी सी है और ठंडा देश है। उन पर जो हमला भी होना है, वो समुद्र के ही रास्ते होना है। तो समुद्रों को नियंत्रित करना उनके लिए बहुत ज़रूरी था। उसी से उन्हें अपनी रक्षा करनी थी, उसी से उन्हें व्यापार करके समृद्धि पानी थी।
तो 15वीं-16वीं शताब्दी में समुद्र में बड़ी होड़ लगी हुई थी, जिसमें ब्रिटेन की प्रतियोगिता थी, सबसे ज़्यादा स्पेन और पुर्तगाल के साथ। जो कोई समुद्र पर राज करेगा, ये पक्का था कि वही व्यापार पर राज करेगा। लेकिन समुद्र में चलने के लिए जहाज को अपनी जगह का पता होना ज़रूरी होता है, नहीं तो जहाज चल तो देगा ब्रिटेन से, पहुँच पता नहीं कहाँ जाएगा। पता कैसे करें? जो लैटीट्यूड होता है, अक्षांश, उसको पता करना आसान होता है। सूरज की स्थिति देख लो, पता चल जाता है। वो आसान होता है। लेकिन लोंगिट्यूड पता करना मुश्किल होता है, जिसे हम देशांतर बोलते हैं। वो पता करना मुश्किल होता है। और वो नहीं पता रहेगा अगर आपको, तो आपका जहाज कहीं भी इधर-उधर भटक जाएगा, टकरा जाएगा, टूटेगा।
एक बड़ी भारी दुर्घटना भी हुई थी इंग्लैंड के जहाज की। वहाँ 1300 लोग थे। वो लोंगिट्यूड ठीक से नहीं समझ पाए, तो वो जाकर भिड़ गए। 1300 के 1300, वो पूरा जो दस्ता ही था जहाजों का, वो पूरा ही मारा गया। वो जाकर एक पथरीली चट्टानों से जाकर भिड़ गया।
तो अब अगर ब्रिटेन को अपने आप को सुरक्षित रखना है, सबसे पहले सुरक्षित और उसके बाद संपन्न, तो ज़रूरी है कि जहाज यात्रा करें। चाहे वो ट्रेडिंग शिप हो, चाहे नेवी शिप हो जहाज यात्रा करे। और जहाज यात्रा करे, उसके लिए ज़रूरी है कि लोंगिट्यूड पता चले।
तो आपने जीएमटी सुना है न? ग्रीनविच मीन टाइम। तो अभी हम बात कर रहे थे 1610 के आसपास की। 1675 में वहाँ पर राजा ने जो रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी है ग्रीनविच में, उसका उद्घाटन किया और उसका एक ही लक्ष्य था कि लोंगिट्यूड कैसे डिटर्मिन किया जाए और इंग्लैंड दुनिया में सबसे आगे निकल गया, इस एक चीज़ में, लोंगिट्यूड पता करने में कि अगर कोई जहाज़ किसी जगह पर है तो उस जगह का अपना वो लोंगिट्यूड कैसे पता कर ले।
ब्रिटेन ने पता कर लिया, ब्रिटेन ने तकनीक निकाल ली। और वो तकनीक अगले 300 साल तक भारत की ग़ुलामी बनी; एस्ट्रोनॉमी। एस्ट्रोनॉमी थी तकनीक।
ठीक जब हम हॉरोस्कोप्स से खेल रहे थे, ब्रिटेन टेलीस्कोप से खेल रहा था। और वही जो अंतर था, हॉरोस्कोप वर्सेस टेलीस्कोप, वो भारत की कॉलोनी, नोनीयल ग़ुलामी बन गया।
हॉरोस्कोप वर्सेस टेलीस्कोप; वो भारत की ग़ुलामी बन गया। जहाज़ हमारे पास भी थे, पर हमारे पास एस्ट्रोलॉजी थी, एस्ट्रोनॉमी नहीं थी। और हमारे जहाज़ कुछ मायनों में ब्रिटिश जहाज़ों से बेहतर थे। इसका प्रमाण हमें ये मिलता है कि अंग्रेज़ जब भारत आए थे तो उन्होंने भारतीय बंदरगाहों पर ही बने कई जहाज़ ख़रीदे। उन्होंने कहा, “यहाँ भी जहाज़ अच्छे बनते हैं।” उन्होंने भारतीय बंदरगाहों पर ही बने कई जहाज़ ख़रीदे। हमारे जहाज़; हमारे पास एस्ट्रोनॉमी नहीं थी।
एस्ट्रोनॉमी माने क्या होता है?
जान पाना कि ये सारे जो चाँद तारे हैं, ये किस आधार पर गतियाँ करते हैं, ये किस आधार पर गतियाँ करते हैं। और अगर वो जान पा रहे हों, तो फिर आप समुद्र में यात्रा कर सकते हो। उनको देख-देखकर समुद्र में यात्रा कर लोगे, क्योंकि और तो कुछ था नहीं सैटेलाइट नेवीगेशन तो था नहीं इन्हीं को देखकर यात्रा करनी है। उनको देखकर यात्रा करने के लिए एस्ट्रोनॉमी चाहिए। जहाज़ हमारे पास भी थे, पर हमारे सारे जहाज़ मानसून सर्किट पर डिपेंड करते थे और वो अधिक से अधिक जाते थे, इधर अरब तक चले जाते थे या ईस्ट अफ़्रीका चले जाते थे या साउथ ईस्ट एशिया चले जाते थे। एक-दो महीने तक का काम कर लेते थे, और जो मानसून विंड्स का पैटर्न था, उसको फॉलो करते थे, एनर्जी के लिए। विंड पावर पर चलते थे। तब तक इंजन तो होता नहीं था न।
तो चाहे वो अंग्रेज़ी जहाज़ हो कि भारतीय जहाज़ हो, चलता तो वो विंड एनर्जी पर ही था। वही सेल्स मास्ट्स लगे होते थे, उन्हीं को विंड के कॉस्पॉन्डिंग एडजस्ट करके आप जहाज़ को गति दिया करते थे। हमारे पास भी जहाज़ थे, पर हमारे पास एस्ट्रोलॉजी थी, एस्ट्रोनॉमी नहीं थी। नहीं तो हो सकता था कि जैसे समुद्र पर चलकर वो यहाँ आ गए, उन्हीं समुद्रों को लाँघकर हम भी वहाँ चले जाते। जैसे वो यहाँ आ गए, वैसे हम भी वहाँ चले जाते। पर हम वहाँ पहुँच ही नहीं पाते। क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए क्या चाहिए? एस्ट्रोनॉमी चाहिए। हम वहाँ पहुँच ही नहीं पाते।
और एस्ट्रोनॉमी ये नहीं कहती कि पुरानी जो किताब पढ़ी है, उसमें जो लिखा है वही सत्य है। एस्ट्रोनॉमी कहती है, प्रेक्षण, अवलोकन, तथ्य, अनुभवजन्य होगा। देखो, ऑब्ज़र्व करो। उसका नाम ही था द रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी एट ग्रेनिच। भारत को गुलाम इंग्लैंड ने नहीं बनाया है। वो जो जीएमटी वाला जी है, उसने बनाया है। जो जीएमटी वाला जी है न, भारत वहाँ से बना है। वहाँ पे नए-नए इंस्ट्रूमेंट्स बनते थे, कैलिब्रेट होते थे, नए-नए चार्ट्स बनते थे, नेविगेशन टेबल्स बनते थे और सब कैप्टेंस को दिए जाते थे कि इनका इस्तेमाल करके अब तुम इंडिया पहुँच सकते हो या बाक़ी कॉलोनीज़ तक पहुँच सकते हो।
और ये जितने कैप्टनस् होते थे जहाज़ों के, ये सब अपनी यात्रा के दौरान लगातार ऑब्ज़र्वेशंस कर रहे होते थे। यही सब सेलेस्टियल बॉडीज़ का, यानी एस्ट्रोनॉमी के एक्सपेरिमेंट्स कर रहे होते थे। और जब ये वापस पहुँचते थे इंग्लैंड, तो ग्रेनिच में इन्होंने जितना डाटा इकट्ठा किया होता था, ये उनको सौंप देते थे, “हियर इज़ मोर डाटा फॉर यू।” अब आप इस पर और कंक्लूज़न्स निकालिए, और निकालिए। समझ में आ रही है बात ये?
एस्ट्रोलॉजी की जगह अगर भारत ने एस्ट्रोनॉम पकड़ी होती, हम कभी ग़ुलाम नहीं बनते। कभी नहीं।
इनसे पहले, ब्रिटिश से पहले पुर्तगाली यहाँ आ गए थे और पुर्तगालियों का भारत आना, वास्कोडिगामा का उधर केरल की तरफ़ पहुँचना, ये भारत के लिए झटके की तरह था कि इतनी दूर से यहाँ कोई आ कैसे सकता है? इतनी दूर से यहाँ कोई आ कैसे सकता है? क्योंकि हमने साइंस में कभी इन्वेस्टमेंट ही नहीं किया था। मुगलों का ज़माना था, सारा इन्वेस्टमेंट किस में हो रहा था? इमारतों में और कलाओं में। बड़ी-बड़ी इमारतें बनाई जा रही थीं। उसका 1% इन्वेस्टमेंट भी साइंस में नहीं हो रहा था। तो जब वो यहाँ पहुँचता है तो बादशाहों को सदमा लग जाता है कि ये हो कैसे सकता है? हो कैसे सकता है?
ये अंतर होता है विज्ञान में और विश्वास में। विज्ञान आपको दुनिया भर का राजा बना देता है। द सन नेवर सेट्स इन द ब्रिटिश एंपायर।
विज्ञान आपको दुनिया भर का राजा बना देता है। और विश्वास आपको आपके ही घर में मुट्ठी भर गोरों का ग़ुलाम बना देता है। ये अंतर होता है एस्ट्रोलॉजी और एस्ट्रोनॉमी में।
और अभी तो कहानी शुरू हुई है।
ठीक जिन तरीकों से अंग्रेज़ भारत पहुँचे, वैज्ञानिक तरीकों से, जो एस्ट्रोनॉमिकल नॉलेज, कैलकुलेशंस और इंस्ट्रूमेंट्स थे उनके पास, उन्हीं का इस्तेमाल करके उन्होंने भारत पर राज भी करा। क्योंकि राज करने के लिए आपको जगह का पता तो होना चाहिए। द ग्रेट ट्रिग्नोमेट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया 1801 में शुरू हुआ, 1872 तक चला। और उसी सर्वे का इस्तेमाल करके 1857 का जो गदर था, विद्रोह था, वो कुचला गया। क्योंकि ब्रिटिश अकेले थे जिनको सब पता था। ठीक-ठीक कौन सी नदी कहाँ से शुरू होती है और कैसे करके कहाँ पहुँचती है। कौन सा जंगल कहाँ शुरू हो रहा है, कहाँ ख़त्म हो रहा है। ये उन्होंने एस्ट्रोनॉमी से पता कराया। उन्हें पता था कि कौन सी पहाड़ी कितनी ऊँची है। 1857 में ही ब्रिटिश यहाँ से भगा दिए गए होते, अगर उनके पास एस्ट्रोनॉमी नहीं होती। विज्ञान के दम पर उन्होंने राज कराया है। बात समझ में आ रही है?
तो खगोल विज्ञान और वहाँ से क्या आता है फिर? मानचित्रण, मैपिंग, परफेक्ट मैप्स बना लिए उन्होंने। और जिसके पास मैप है, जो बिल्कुल जानता है, अब वो ये भी जानता है, रिसोर्स क्लस्टर्स कहाँ पर हैं, कहाँ से खुदाई करनी है, कहाँ से क्या करना है, रेल्वेज अगर डालनी है तो कौन सा सही रास्ता रहेगा। और भारत किस में उलझा हुआ था इस दौरान भी? कुंडली और मुहूर्त में।
ब्रिटिश बोलते थे, “यू प्रे टू द हेव्स, वी मेज़र देम।” तुम जिनकी पूजा करते हो, हमने उनको नाप लिया है। और ये रही हमारी मशीनें, और ये रही हमारी गणित। जब भारत में बस मकबरे वग़ैरह बन रहे थे, यही वो समय था वहाँ पर कॉपरनिकस, न्यूटन, केप्लर, गैलीलियो; जब वहाँ कैलकुलस आ रहा था। वैसे शायरी का वो भारत में स्वर्णकाल था। ज़बरदस्त शायरियाँ चल रही थीं महबूबा की जुल्फ़ों की याद में।
ठीक तब जब भारत में शायरी चल रही थी, तब वहाँ विज्ञान चल रहा था। मैं शायरी के ख़िलाफ़ नहीं हूँ, पर ये कौन सी शायरी है जो आपको तथ्यों से काटकर कल्पना के रस में डुबो देती है। और इतना ही नहीं था, इसी चीज़ ने कि इनको देखो ये तो हर समय बस एस्ट्रोलॉजी में ही डूबे रहते हैं। ब्रिटिश एंपायर को एक मोरल वैलिडिटी भी दे दी। उन्होंने कहा, “हम तो यहाँ पर आए हैं, इनका सुपरस्टिशन हटाने, इन्हें साइंटिफ़िक बनाने। हम न हो तो ये तो अपनी मूर्खताओं में ही डूबे रह जाएँगे।” उन्होंने कहा, कि “वी हैव अ मोरल राइट टू कम टू दी ब्राउन पीपल एंड एजुकेट देम।” इन्हें क्या आता है?
और बात बिल्कुल सही है। वो जब यहाँ आए हैं, तो उनका विज्ञान हमसे मीलों आगे पहुँच चुका था, क्योंकि उन्होंने विज्ञान की क़द्र की। और ये सोचना भी गलत है कि वो जब यहाँ आए, तो वो ग़रीब थे और भारत सोने की चिड़िया था, तो उन्होंने हमको लूट लिया। तथ्य ये है कि जब यहाँ पर अंग्रेज़ आना शुरू कर रहे थे, उस वक़्त भी भारत का पर कैपिटा जीडीपी इंग्लैंड के पर कैपिटा जीडीपी से काफ़ी कम हो चुका था। गिर चुका था।
दसवीं शताब्दी तक ऐसा था कि भारत का और यूरोप का जीडीपी लगभग बराबर था, बल्कि भारत का थोड़ा ज़्यादा था दसवीं शताब्दी तक। दसवीं शताब्दी, क्राइस्ट एरा, ईसा के हज़ार साल बाद तक भी भारत का, जिसको हम कहते हैं न कि हमारे यहाँ संपन्नता बहुत थी, हम सोने की चिड़िया थे। वो चीज़ चली है बस दसवीं शताब्दी तक। दसवीं शताब्दी के बाद ही भारत गिरना शुरू हो गया है। और जब यहाँ पुर्तगाली, और फ़्रेंच, और ब्रिटिश आने शुरू हुए, उस समय तक वो अमीर हो चुके थे पहले ही। वो ऐसे ही नहीं यहाँ पहुँच गए थे। 800-1000 था। तो हम पहले ही लगभग 30% उनसे नीचे हो चुके थे।
क्यों हो चुके थे? क्या हो गया दसवीं शताब्दी के बाद भारत को? दसवीं शताब्दी के बाद भारत विश्वास में डूब गया। दसवीं शताब्दी से ठीक थोड़ा पहले आते हैं शंकराचार्य, जिन्होंने हमें दिया अद्वैत। दसवीं शताब्दी के बाद के भारत ने अद्वैत को ठुकरा दिया। भारत ने कहा, नहीं, हमें बिलीफ़-बेस्ड सिस्टम चाहिए। हमने वेदान्त को भी बिलीफ़-बेस्ड बना दिया। और ठीक दसवीं शताब्दी के बाद से ही भारत की ग़ुलामी शुरू हो जाती है। जैसे ही भारत में विश्वास आता है, मान्यता आती है कि “मानो, मानो और सिर झुका दो;” वैसे ही भारत में ग़ुलामी आनी शुरू हो जाती है।
भाई, आपको जब कहा जाता है कि आपका फलानी जगह पर है, ये ऐसी राशि में है, ये ऐसा है, वैसा है; कोई प्रमाण है? मान्यता है न बस। विज्ञान प्रमाण पर चलता है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, भारत ने मान्यता पर, विश्वास पर चलना शुरू कर दिया और ये नतीजा है कि हम कहाँ रह गए। आ रही है कुछ बात समझ में?
सोचो, समय जैसी चीज़ और भारत में हर गाँव, हर शहर अपना अलग समय रखता था, सूर्योदय-सूर्यास्त के हिसाब से। उस घड़ी की क़ीमत इतनी थी। देखो, लॉन्गिट्यूड आप निकाल लोगे अगर आपको पता हो; मान लीजिए मैं यहाँ पर हूँ और मुझे दिख रहा है कि अभी सूरज ओवरहेड है, और अगर मुझे ठीक अभी पता हो कि लंदन में टाइम कितना है? मान लो, मैं लंदन से चला एक जहाज़ हूँ। मुझे मेरा समय पता चल गया कि अभी दोपहर के 12:00 बजे हैं। 12:00 बजे आसान होता है। कैसे निकाल लोगे? मान लो, यही देख (सिर पर सूरज होना) लिया। और मुझे उसी वक़्त किसी घड़ी से पता चल जाए कि अभी लंदन में क्या समय है, तो मुझे मेरा समय पता चल गया ना।
हम भली-भाँति जानते हैं कि 1 डिग्री लॉन्गिट्यूड कितने मिनट का अंतर रखता है। ठीक है? तो अगर मैंने देख लिया कि लंदन में अभी बजे हैं 3, और यहाँ बजे हैं 12 तो मुझे पता चल गया कि यहाँ के समय और लंदन के समय में कितना अंतर है। तो मैं ये भी जान गया कि मेरा लॉन्गिट्यूड क्या है। समस्या ये आती थी कि जो पेंडुलम वाली घड़ी होती थी, वो जहाज़ पर काम नहीं कर सकती थी, क्योंकि जहाज़? (हिलता रहता है)। तो ज़बरदस्त तरीके से अंग्रेज़ों ने इन्वेस्टमेंट किया घड़ियों में। वो एक स्ट्रैटेजिक डिसीजन था। और उसने उन्हें दुनिया का बादशाह बना दिया, क्योंकि वो लॉन्गिट्यूड निकालना सीख गए।
और जहाँगीर को समझ में नहीं आया। जहाँगीर ने कहा, “ये ज़रा-सी चीज़, घड़ी, लेके आए हो।” अरे, यही घड़ी जो है न ये मुगल सल्तनत का काल बनेगी। उस घड़ी में समय नहीं था, काल था। जहाँगीर को बात समझ में नहीं आई। घड़ी में काल था।
हम अभी भी अपने तौर-तरीके, ढर्रे, छोड़ नहीं रहे हैं। अभी भी नहीं छोड़ रहे हैं। जो ग्रीनविच वाली मेरिडियन है, वो यूँ ही दुनिया का समय नहीं बन गई। वो वास्तव में पूरी दुनिया ने इंग्लैंड के सामने सिर झुका के माना था, कि यू रूल टाइम। और इसलिए दुनिया भर का समय जीएमटी से चलेगा। जीएमटी प्लस इतना, जीएमटी माइनस इतना, ये होती है एस्ट्रोनॉमी। टाइम जानना है तो एस्ट्रोनॉमी चाहिए होगी।
जिसके पास एस्ट्रोनॉमी है, वो काल पर राज करता है। जिसके पास एस्ट्रोलॉजी है, वो काल का ग्रास बनता है।
बात आ रही है समझ में?
मैं आपसे कितना ही बोल दूँ, आप में से भी बहुत लोग हैं, शायद ज़्यादातर लोग हैं जो उन चीज़ों को मानते ही मानते जा रहे हैं। आपको बात नहीं समझ में आ रही। आप गीता भी चला लेते हैं और कुंडली भी चला लेते हैं। इकट्ठे दोनों को चला कैसे लेते हैं, आपकी महिमा अपरंपार है।
और जो पूरा इतिहास है एस्ट्रोनॉमी का, आप उसको पढ़िए तो देखिए कि कितनी ठोकरें खाई हैं। कितने उनके लोग मरे, कैसे-कैसे उन्होंने प्रयोग किए। आप उनकी कैलकुलेशन्स की फाइननेस देखिए, उनके टेबल्स का विस्तार देखिए, ह्यूज, इलबोरेट मेरिटाइम टेबल्स और उनके इंस्ट्रूमेंट्स का सोफिस्टिकेशन देखिए। अब उसके बाद बताइए कि हम ग़ुलाम न बनते तो क्या बनते? वो बहुत आगे निकल चुके थे, क्योंकि उन्होंने ये नहीं कहा कि सारी सच्चाई तो इस किताब में लिखी हुई है। उन्होंने कहा, हम जानेंगे, हमें प्रयोग करने दो। ये मटीरियल वर्ल्ड है, यहाँ माना नहीं जाता, यहाँ प्रयोग किया जाता है। और जब भीतरी जगत की बात आती है, इनर वर्ल्ड, वहाँ भी तरीका तो वही लगाना होता है जो बाहर लगाना होता है। क्या? आत्म-अवलोकन। एस्ट्रोनॉमी माने आकाश-अवलोकन, आकाश को देख रहे हैं। और स्पिरिचुअलिटी माने आत्म-अवलोकन, भीतरी आकाश को देख रहे हैं। लेकिन मान्यता तो न उधर चलनी है, न इधर चलनी है।
भारत ने मान्यता को पकड़ा। आप भी पकड़कर बैठे हो। “नहीं, हमारी तरफ़ ऐसा माना जाता है। तो क्या मतलब होगा न? सब हमारे पुरखे मानते आए हैं तो बेवकूफ़ थे क्या?” बेवकूफ़ तो पता नहीं, पर ग़ुलाम ज़रूर थे। और ये हिस्टोरिकल फ़ैक्ट है, आप भी इनकार नहीं कर सकते। बेवकूफ़ बोलूँगा तो आपको बुरा लग जाएगा, लेकिन कैसे मानने से इनकार करो कि ग़ुलाम थे। और कुछ तो कमी रही होगी न कि ग़ुलाम होना पड़ा। और यही मत बोल दो, कि अरे, अंग्रेज तो धूर्त थे, इसलिए ग़ुलाम बना लिया। धूर्तता की तो देखो, हम में भी कोई कमी है नहीं। तो अंग्रेज थे बिल्कुल मक्कार, बेशक, बिल्कुल मक्कार थे। लेकिन मक्कारी भर से वो नहीं छा गए हम पर। बात एस्ट्रोनॉमी की थी। एस्ट्रोनॉमी; डेडिकेटेड इन्वेस्टमेंट एंड रिस्पेक्ट टुवर्ड्स एस्ट्रोनॉमी, साइंस इन जनरल।
रेनसां अभी-अभी समाप्त हुआ था, जिस जहाँगीर के समय की हम बात कर रहे हैं। यूरोप में ठीक उससे पहले रेनसां अभी समाप्त हुआ है, और अब शुरू क्या हो रहा है? द एज ऑफ़ एनलाइटनमेंट, द एज ऑफ़ रीजन। और द एज ऑफ़ रीजन और भारत में द एज ऑफ़ स्लेवरी बिल्कुल साथ चले हैं। यूरोप में जैसे-जैसे तर्क-युग आगे बढ़ा है, भारत में वैसे-वैसे ग़ुलामी आगे बढ़ी है। क्योंकि वो चल रहे हैं तर्क पर, और हम चल रहे हैं मान्यता-विश्वास पर।
“हम तो ऐसा मानते हैं जी। ऐसा तो होगा न जी। मानने से ही तो होता है जी। मानोगे तभी मिलेगा। बच्चा, सवाल मत करो, मान लो।”
और बहुत भारी क़ीमत चुकाई भारत ने ये मानने, मान्यता, विश्वास, आस्था के खेल की। बहुत भारी क़ीमत चुकाई। इतने सही नहीं मान गए थे वो कि हमारे पास रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी वहाँ ग्रेनिच में है। यहाँ आकर मुंबई में, मद्रास में, कोलकाता में, यहाँ पर भी ऑब्ज़र्वेटरी स्थापित करी उन्होंने। तो जो आप फ़िल्मों में देख लेते हो न कि ब्रिटिश राज तो ऐसे चल रहा था कि वो कोड़े लेकर खड़ा हो जाता था और मारना शुरू कर देता था। नहीं साहब, वो कोड़े से नहीं, साइंस से चल रहा था। कोड़े चलाने वाले तो एशिया में भी बहुत थे। हम चंगेज़ ख़ान, तैमूर लंग, ऐसों को भूल जाएँगे क्या? कोड़ेबाज़ी तो इधर-आसपास के लोगों ने भी खूब कर ली। उससे नहीं हो जाता। यूरोपियन्स के पास मक्कारी थी बेशक, लेकिन मक्कारी से आगे भी बहुत कुछ था।
कैसे चल लेती ट्रेन्स, अगर टाइम ही स्टैंडर्डाइज़्ड नहीं है? टाइम बहुत बड़ी बात होती है, और टाइम और एस्ट्रोनॉमी एक साथ चलते हैं। जब यहाँ पर पहुँचे सब ये अंग्रेज़ी जहाज़, तो एक जो हम हिंदुस्तानियों के लिए बड़े अचरज की बात थी, वो ये थी कि एक चला है वहाँ पोर्ट्समाउथ या प्लायमाउथ से, और एक चला है केप ऑफ़ गुड होप से माने दक्षिणी अफ़्रीका से। और आपने सिंक्रोनाइज़ कैसे किया कि ये दोनों एक साथ पहुँच रहे हैं सूरत? इतनी टाइम-कीपिंग आपको आई कहाँ से? तब छोटी बात लगी, ठीक वैसे ही जैसे जहाँगीर ने कहा था, “ये घड़ी-घड़ी से क्या होता है।” बहुत बड़ी बात थी, एस्ट्रोनॉमी।
एक जहाज़ चल रहा है हथियार लेकर, और एक जहाज़ चल रहा है माल लेकर। और दोनों अगर बिल्कुल एक साथ नहीं पहुँच रहे हैं, तो माल वाला लुट जाएगा। और दोनों एक ही जगह से नहीं चल रहे हैं। क्योंकि जो माल वाला है, उसको माल कहीं और से लेना है। जो माल है, वो इंग्लैंड से नहीं आ रहा है, माल अफ़्रीका से आ रहा है। हथियार आ रहे हैं इंग्लैंड से, पर उनकी टाइमिंग ऐसे करनी है कि दोनों इकट्ठे पहुँचें।
ये चीज़ है जो किसी को विश्व-शक्ति बनाती है, और किसी को वो बनाती है जो हम बन गए। छोटे-मोटे नुकसान नहीं होते हैं, अंधविश्वास दीमक है इंसान की, खा जाता है पूरे तरह से। बहुत बड़े-बड़े नुकसान होते हैं, व्यक्तिगत तल पर, पारिवारिक तल पर, सामाजिक तल पर, राष्ट्रीय तल पर। बंदा कहीं का नहीं बचता। तीन से छह महीने की यात्रा होती थी इंग्लैंड से भारत की, तीन से छह महीने की। और उसमें कोई मोटर नहीं लगी हुई है। किसके भरोसे चल रहे हैं? हवाओं के भरोसे।
तो वहाँ भी टाइम-कीपिंग बहुत ज़रूरी है। क्योंकि जब ऊपर से आओगे नीचे, नॉर्दर्न अटलांटिक से इक्वेटर की तरफ़ आओगे, तो आपको चाहिए नॉर्थ-ईस्ट ट्रेड विंड से अपने आप को सिंक्रोनाइज़ करना है। इक्वेटर से नीचे जाओगे, तो साउथ-ईस्ट ट्रेड विंड से सिंक्रोनाइज़ करना है। और ये सब करके आपको साउथ अफ़्रीका ठीक तब पहुँचना है, जब भारत में मानसून सक्रिय होने वाला हो। ताकि जो मानसूनी हवाएँ हैं, वो अरेबियन सी से हिंदुस्तान की ओर आ रही हों, तो उनके साथ-साथ आपका जहाज़ भी आ जाए।
आपको परफ़ेक्ट टाइमिंग करनी है ट्रेड विंड्स और मौसूनल विंड्स के बीच में। और आपने ये टाइमिंग नहीं करी, तो आपका जहाज़ भूख और बीमारी से मर जाएगा। कोई सैटेलाइट कम्युनिकेशन तो है नहीं न। जहाज़ में इतना (थोड़ा) ही खाना है। सही टाइमिंग नहीं हुई, तो जहाज़ वहाँ पड़ा हुआ। उसमें कोई मोटर नहीं, इंजन नहीं, फ़्यूल नहीं है, स्टीम नहीं है, गैसोलीन नहीं है। उसमें कुछ नहीं है। परफ़ेक्ट साइंस और परफ़ेक्ट कैलकुलेशन ऑफ़ स्टार्स चाहिए। परफ़ेक्ट कैलकुलेशन ऑफ़ स्टार्स, सिर्फ़ इन्हीं स्टार्स के भरोसे एक के बाद एक उनके जहाज़ भारत आते रहे, भारत को जीतते रहे। और हम भी इन तारों को देखकर बस ये बोलते रहे, “कृपा बरसा दो।” कृपा तो नहीं बरसी, अंग्रेज़ बरस गए। वही तारे थे, वही तारे।
हम वहाँ क्या देख रहे थे? “लक्षण ख़राब है, लगता है कि अब कुछ कुसंयोग होने वाला है। इस लड़की का पति ज़्यादा नहीं चलेगा।” भारत भी आसमान की ओर देख रहा था, अंग्रेज़ भी आसमान की ओर देख रहे थे। पर हमारे ये सब शास्त्री लोग बैठकर क्या बताते थे? कि अभी आसमानी संदेश मिला है। पोथे में लिखा है कि यदि ये विवाह हो गया, तो इस कन्या का पति ज़्यादा नहीं चलेगा।
और वो आसमान की ओर देख रहे थे, तो वहाँ रिगरस कैलकुलेशन कर रहे हैं बैठकर के। रिगरस साइंटिफ़िक कैलकुलेशन, जो कि एक के बाद एक जो रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी थी ग्रेनिच की, उसके जो प्रमुख आते रहे, वो ऑब्ज़र्वेशन्स को भी और ज़्यादा शुद्ध, शुद्ध और शुद्ध करते रहे। और ये सारी टेक्नोलॉजीज़ मल्टीपर्पस बनती गईं।
जिन टेक्नोलॉजीज़ से आप आसमान को देख रहे हो, उन्हीं को डिराइव करके आप समुद्र में भी देख पा रहे हो। जो टेक्नोलॉजीज़ समुद्री यात्रा करने के काम आ रही हैं, वही टेक्नोलॉजीज़ कार्टोग्राफ़ी, यानी मैप-मेकिंग, मानचित्रण के काम आ रही हैं। और सारी टेक्नोलॉजीज़ के पीछे क्या है? साइंटिफ़िक एटीट्यूड। ये नहीं कि शनि और राहु और केतु।
सोचो कैसा होता, बस एस्ट्रोलॉजी की जगह एस्ट्रोनॉमी होती भारत में, तो आज हम कैसे होते? कहाँ होते? सोचो। लो एक मिनट और सोचो इस बात को। हमने एस्ट्रोलॉजी पर जितना ख़र्च किया, भारत के एक-एक बाशिंदे ने इन सब चीज़ों पर खूब ख़र्चा हुआ है कि नहीं? और कितनी शताब्दियों से ख़र्च रहे हैं हम। जब से हमको बता दिया गया है कि हमारी किस्मत लिखने वाला कोई और है, और हमारा पहले ही सब लिख दिया गया है, तब से हम इस पर ख़र्चा करे ही जा रहे हैं।
जितना ख़र्चा हमने ये सब जानने पर करा कि “क्या लिखा है मेरे भाग्य में?” उसका 1% ख़र्चा भी हमने भाग्य बनाने पर कर दिया होता, तो बताओ आज भारत कहाँ होता? पर हम ख़र्चा करते रहे भाग्य जानने पर। वो बताएँगे पंडित जी। “पंडित जी, मेरा भाग्य बता दो।”
भाग्य कोई बताता नहीं है, भाग्य बनाया जाता है। बनाया जाता है। हमने बनाया नहीं, हम किसी और से पूछते रहे।
और क्यों पूछते रहे? क्योंकि हमने कह दिया, कोई और है मेरा भाग्य-विधाता, जो रचता है सबकी किस्मतों को। जबकि अद्वैत वेदान्त आपको साफ़ बोलता है कि परम सत्ता यहाँ (अपने भीतर) बैठी हुई है। कोई और नहीं रचता तुम्हारी किस्मत को। तुम हो, तुम हो और तुम ही हो। वेदान्त था हमारे पास, पर हमने वेदान्त के अर्थ को भी विकृत कर डाला। हमने कहा नहीं-नहीं, हमारा भाग्य-विधाता वहाँ बैठा है, आसमानों पर बैठा है।
सोचो न आप। जहाज़ भी थे। जहाज़ भी थे हमारे पास, जहाज़ में भी ऐसी कोई कमी नहीं। क्योंकि ट्रेड व्यापार तो हम करते थे। छोटे एरिया में करते थे, पर हम भी करते थे। पर एस्ट्रोनॉमी नहीं थी, तो हमारा जहाज़ बहुत दूर नहीं जा सकता था। उसको समझ में ही नहीं आता, कहाँ पहुँच गया।
किन-किन क्षेत्रों में आप देख रहे हो कि आप अपने कौशल, अपने ज्ञान, अपने पुरुषार्थ से ज़्यादा महत्त्व भाग्यवाद को देते हो। शादी करनी है, तो आप पूछते हो जाकर के कुंडली में क्या लिखा हुआ है। न आपको सामने वाले व्यक्ति को समझना है, न ज्ञान से मतलब है, न प्रेम से मतलब है; न तो उस व्यक्ति को मैंने जाना। ना इस बात का महत्त्व है कि प्रेम कितना है, किस बात का महत्त्व है? कि गुण कितने मिल रहे हैं, देखो जरा पंडित जी।
व्यापार शुरू करना है, तो वहाँ पर; कहीं पैसा लगाना है, तो वहाँ पर; माने ज़िंदगी के हर क्षेत्र में तो आपने इस अंधविश्वास को घुसेड़ रखा है। तो कहाँ से भारत आगे बढ़ जाए? रोहित का नाम है, आर-ए-यू-ट्रिपल एच-आई-पी-टी; ये न्यूमरोलॉजी है, जाने कौन सी लॉजी है। रोहित सोच रहा है, ऐसा करके उसने नया-नया मीट का बिज़नेस शुरू कर दिया, तो मीट का बिज़नेस चमक जाएगा।
उसे बताया गया है कि तुम्हारी सारी समस्या ये है कि तुम्हारा नाम बस आर-ओ-एच-आई-टी है, इसको करो, आर-ए-यू-ट्रिपल एच-आई-पी-टी। कोई क्षेत्र बता दो जीवन का, जहाँ आप अंधविश्वास से मुक्त हो। बताओ।
बीवी छोड़कर भाग गई, “अरे, ज़रूर इसमें सितारों की कोई चाल है।” सितारों की नहीं चाल है, तुम्हारे मुँह पर चाँद-तारे बने हैं, कौन देखे तुम्हारा मुँह दिन भर?
आप जाइएगा, पढ़िएगा। कितनी ऐसी लड़ाइयाँ हैं, जो हमने इसलिए हारी क्योंकि अभी फायर करने का सही मुहूर्त नहीं आया है; देखिएगा जाकर। दुर्ग बन गए हैं, और अगर राजा जी सही समय पर दुर्ग में चले गए होते, तो शायद बच जाते। पर अभी तो मुहूर्त ही नहीं निकला है दुर्ग प्रवेश का। और हमें कहा जाता है, “नहीं, ये भी तो साइंटिफ़िक है। देखो, इसमें भी तो गणनाएँ होती हैं।” भाई, गणनाएँ आप कर सकते हो चाँद-तारों की। वो आपने कौन सी गणना करी है बताओ, जहाँ पर ये हो कि उसका इस पर क्या असर पड़ रहा है? इसकी कोई गणना है? ये तो सुपरस्टिशन है।
हाँ, आप ये गणना ज़रूर कर सकते हो, कि चंद्र ग्रहण किस दिन लगेगा। बिल्कुल कर सकते हो। ठीक है, उससे आप पंचांग बना लोगे अपना, अच्छी बात है। पर उसके आगे जाकर अगर आप ये बोलोगे, कि अब उस चंद्र ग्रहण का इस युवती के जीवन पर ये असर पड़ेगा, तो ये अंधविश्वास के अलावा और क्या है? ये और क्या है? ये बहुत हो चुका। हज़ार साल से ज़्यादा हो चुका, अब समय आ गया है इसे जड़ से उखाड़ कर फेंक देने का। ये जो भीतर बात बैठ गई है न कि “बिलीफ इज़ सेक्रेड, ट्रुथ इज़ सेक्रेड; ट्रुथ इज़ सेक्रेड, बिलीफ इज़ नॉट सेक्रेड।” सर, झुकाना बंद करो।
और कोई आके आपके सामने खड़ा होता हो बार-बार कि “नहीं, नहीं, हमारी ऐसी बिलीफ्स हैं, आप इसकी रिस्पेक्ट करिए।” मना कर दो, कह दो बिल्कुल रिस्पेक्ट करेंगे, सत्य की करेंगे, मान्यता की नहीं रिस्पेक्ट होती।
सत्य पवित्र होता है, सेक्रेड होता है। करेंगे, सम्मान बिल्कुल करेंगे, सर पूरा झुकाएँगे। पर तुम कुछ भी अंडू-पंडू ख़यालात, कल्पनाएँ लेकर आ जाओगे और कहोगे, “हमारी तरफ़ ऐसा माना जाता है।” तो हम उसको थोड़ी पवित्र मान करके उसको पूजने लगेंगे।
अध्यात्म का अर्थ होता है, सत्य के अलावा ये सर कहीं नहीं झुकेगा। नेति-नेति का अर्थ ही यही होता है, न तेरे आगे भी नहीं झुकेगा, न तेरे आगे भी नहीं झुकेगा, क्योंकि तू भी मिथ्या है और तू भी मिथ्या है।
और साफ़-साफ़ देखो कि जैसे-जैसे भारत से अद्वैत पीछे हटा, वैसे-वैसे कैसे भारत पतन में जाता गया। क्योंकि जहाँ आपने ये कह दिया कि भगवान यहाँ (अपने भीतर) नहीं है, भगवान वहाँ (बाहर) है, वैसे ही आप क्या हो गए? कठपुतली बन गए न फिर तो। और जो कठपुतली है, उसके पास कोई ज़िम्मेदारी तो होती नहीं। और जिसके पास ज़िम्मेदारी नहीं, वो इंसान नहीं; वो तो बोल देगा, “मुझे क्या करना है, जो हो रहा है, वो तो कोई और चला रहा है न। हम तो कठपुतली हैं। हम तो बैठे हुए हैं, हमें क्या करना है? अब आ गए अंग्रेज़, हम बन गए ग़ुलाम। हम क्या करें? भाग्य में लिखा था। भाग्य में लिखा था, हम क्या कर सकते हैं? अंग्रेज़ आ गए, हमें ले गए, तो हमारी भारत की कुंडली में ऐसा लिखा था।”
अच्छा, झूठ मत बोलना, कितने लोगों के यहाँ अभी चल रहा है कुंडली वाला कारोबार? सही से हाथ खड़ा करना। कर दो, शाबाश, शाबाश। इतने ही सच्चे लोग हैं क्या यहाँ पर? जिन्होंने किया भी, उन्होंने ऐसे करके फिर ऐसे। आधे तो मोबाइल फ़ोन में लेके घूम रहे होंगे, सॉफ्ट कॉपी। “आचार्य जी बहुत दुखी हैं।” क्या है? “बिटिया मांगलिक है।”
जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और अपने भीतर से उठती विज्ञान की, तर्क की, सच की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, बल्कि सच की आवाज़ों को दबाता है और सज़ा देता है, तो फिर नतीजा ये निकलता है कि कोई बाहरी ताक़त आकर उसको पाठ पढ़ाती है और ग़ुलाम बनाती है।
यही तो बोलते हैं अंग्रेज कि ये हिंदुस्तानी अंधविश्वास में इतने गहरे डूबे हुए थे कि हम तो हिंदुस्तान के लिए वरदान बनकर आए। वो आधा झूठ बोल रहे हैं, हो सकता है आधे से ज़्यादा झूठ बोल रहे हों। पर वो जहाँ से कह रहे हैं, समझो उनकी बात को भी, क्योंकि वो अपने आपको कॉलोनियल हिस्ट्री ऐसे ही पढ़ाते हैं। वो कहते हैं, शिक्षा इनके पास नहीं थी। साइंस इनके पास नहीं था। मॉडर्न लॉज़ एंड फ़्रीडम्स इनके पास नहीं थे। डेमोक्रेसी इनके पास नहीं था। हमने ही तो जाकर के सब दिया है। हज़ार तरीक़े का एक्सप्लॉयटेशन और डिस्क्रिमिनेशन इनके यहाँ था।
आप वहाँ जाएँगे तो उनकी टेक्स्ट‑बुक्स में वो ऐसे ही पढ़ाते हैं अपने बच्चों को। जो कि हम बिल्कुल मान रहे हैं कि ये बात आधी से ज़्यादा झूठ है और बेईमानी की है। क्योंकि आप यहाँ हमारा भला करने नहीं आए थे। आप यहाँ हमारा शोषण करने आए थे। आपने रेलवेज़ दी बिल्कुल, पर इसलिए नहीं दी कि हम उसमें सुविधा से यात्रा करें। रेलवेज़ इसलिए दी ताकि आपका माल, रसद और आपके सैनिक जल्दी से एक जगह से दूसरी जगह पहुँच पाएँ।
हम जानते हैं ये सब अपने चाहे वो टेलीग्राम हो, कम्युनिकेशंस हों, जितनी भी चीज़ें हैं, लॉ एंड ऑर्डर है, सोशल‑लीगल रिफ़ॉर्म है, हमें मालूम है आपने ये सब कराया, लेकिन उसमें आपका अपना स्वार्थ था। लेकिन ये भी तो सोचो कि ये सब करने की किसी विदेशी को ज़रूरत क्यों पड़ी, क्योंकि हम ख़ुद असमर्थ हो गए थे ये सब करने में। हमारे ऊपर क्या छा गए थे लोकधर्म के ठेकेदार जिन्होंने कहा, “आवाज़ उठाओगे तो मारेंगे बहुत ज़ोर से। बस जो कह रहे हैं, चुपचाप मानो। और जहाँ सिर झुकाने को बोल दिया, वहाँ सिर झुका दो।”
मुझे बहुत आशंका होती है और चिंता होती है कि भारत में फिर से ये जो लहर उठती देख रहा हूँ, जो आपका सवाल था एस्ट्रोलॉजी और इस तरह के पचास तरीके के अंधविश्वास और पिछड़ी हुई मानसिकताएँ, ये जो फिर से चढ़ रही हैं, इसका अंजाम क्या होने वाला है भारत के लिए। एक बार हम अंजाम देख चुके हैं। एक बार नहीं, हम कई बार अंजाम देख चुके हैं; पिछले हज़ार सालों में हमने कई बार इसका अंजाम देखा है।
हम जिसको ब्रिटिश फ़ौज कहते हैं न वो फ़ौज नहीं थी, इन्होंने जहाँगीर से परमिट मालूम है काहे का लिया था? फ़ैक्ट्री डालने का। और वहाँ फ़ैक्ट्री का मतलब प्रोडक्शन सेंटर नहीं होता था, स्टोरेज सेंटर होता था। प्रोड्यूस क्या करोगे? ये इन चीज़ों का कारोबार करते थे, इंडिगो, नील, स्पाइसेज़ ये सब होता था, कॉटन, ये सब चीज़ें थीं जो ये यहाँ से ले जाते थे। तो अब ये प्रोड्यूस थोड़ी करेंगे उसके अंदर। ये सब तो एग्रेरियन प्रोडक्ट्स थे न, खेती की चीज़ें थीं।
तो ये जिसको फ़ैक्ट्री बोलते थे, वो क्या होता था वास्तव में? समझ लो भंडार, गोदाम है, इन्वेंटरी है। तो उसकी रक्षा के लिए जो गार्ड खड़े किए जाते थे न, बस इतने ही सैनिक थे इनके पास, ईस्ट इंडिया कंपनी के पास। मद्रास, सूरत, कोलकाता, देश में पाँच‑छह जगहों पर इनके पास क्या थीं? ये स्टोरेज फ़ैसिलिटीज़ थीं। अब जहाँ स्टोरेज फ़ैसिलिटी होगी, वहाँ पे उसकी रक्षा के लिए गार्ड्स होंगे। तो कुल इतने ही थे, बाबा; कुल इतने ही थे ये।
1708 में औरंगज़ेब की मौत हुई है, 1757 में प्लासी का युद्ध हुआ है। प्लासी के युद्ध में 3000 से कम थी अंग्रेज़ों की फ़ौज। और उसमें भी सारे अंग्रेज़ नहीं थे, सिराजुद्दौला के 50,000 थे। और बंगाल जिसने जीत लिया; बंगाल उस वक़्त बहुत बड़ा था, जिसने बंगाल जीत लिया फिर वो मैसूर भी जीतेगा, वो दिल्ली भी जीतेगा, मराठों को भी जीतेगा। अधिक से अधिक 3000,वो भी क्या? फ़ैक्ट्री के गार्ड्स। क्योंकि कंपनी है, कंपनी के पास सैनिक तो नहीं होते ना। अरे, कंपनियाँ होती हैं। कंपनियों के पास क्या होते हैं? सोल्जर्स होते हैं या गार्ड्स होते हैं?
श्रोता: गार्ड्स।
आचार्य प्रशांत: तो स्टोरेज यूनिट के बाहर जो गार्ड खड़े होते थे कि यहाँ कोई लूट‑पाट करने आए तो उसकी रक्षा हो, वही थे बस ईस्ट इंडिया कंपनी के पास। हम उनसे हारे हैं। क्योंकि उनके पास साइंस थी। उनके पास टेलीस्कोप था, हमारे पास हॉरोस्कोप था। हम उनसे हारे।
जब वो आए थे, उन्होंने सोचा थोड़ी था कि यहाँ ग़ुलाम बनाएँगे। वो तो सचमुच 1611 की मैंने आपको बताई थी, 1605 से 1611 के बीच में उन्होंने कोशिशें करी थीं। उनसे पहले यहाँ पुर्तगाली बैठे थे। पुर्तगाली अंग्रेज़ों को घुसने भी नहीं दे रहे थे। वो तो लगभग समझिए कि 100 साल तक तो बहुत शांतिपूर्वक बस क्या करते रहे? व्यापार ही करते रहे। उसके बाद ये मुग़लिया सल्तनत बिल्कुल धराशायी हो गई, टुकड़े‑टुकड़े हो गई।
हर तरफ़ से छोटे‑छोटे राज्य निकलने लगे, ताक़तें निकलने लगीं। तो फिर उसमें अंग्रेज़ों ने भी अपना नंबर लगा दिया। बोले, जब अभी फ़्री‑फ़ॉर‑ऑल है जो केंद्रीय ताक़त थी, वो ध्वस्त हो चुकी है, और सब छोटी‑छोटी ताक़तें अपनी क़िस्मत आज़मा रही हैं, तो हम भी कर लेते हैं। और उन्होंने कहीं बेहतर दक्षता के साथ, स्किल के साथ किया। क्योंकि उनके पास क्या था?
श्रोता: साइंस।
*आचार्य प्रशांत: साइंस थी, एस्ट्रोनॉमी थी। एस्ट्रोनॉमी जो एक चीज़ इतिहास में हमें कम पढ़ाई जाती है, वो है ब्रिटिश लॉजिस्टिक्स। ब्रिटिश स्पीड। जिस तेज़ी के साथ ब्रिटिश फ़ोर्सेज़ मूव करती थीं, भारतीयों ने वो तेज़ी अपने इतिहास में कभी देखी ही नहीं थी। क्योंकि उनके पास कार्टोग्राफ़ी थी, मैप‑मेकिंग थी। उनको सब पता था, यहाँ से यहाँ, यहाँ से यहाँ, यहाँ से यहाँ। ये भी पता था कि दुश्मन की फ़ौज आ रही है तो ठीक किस जगह पर उसको रोका जा सकता है, घेरा किया जा सकता है, एंबुश किया जा सकता है। क्योंकि उनके पास एस्ट्रोनॉमी थी।
वो टाइड से भी अपने मूवमेंट को सिंक्रोनाइज़ कर लेते थे। मीन‑वाइल, देसी लोग (माथे की ओर इंगित करते हुए), “कोई अपनी माथे की रेखाएँ थोड़ी बदल सकता है। अरे, पिछले जन्म के कर्म हैं, भुगतने तो पड़ेंगे न। होइहि सोइ जो राम रचि राखा।”
अरे, वहाँ “राम” का अर्थ क्या है? तुमने समझा क्या? तुमने हर ऊँची बात को भाग्यवाद; सिर्फ़ इसलिए, ताकि व्यक्तिगत रूप से जीवन में अपनी ज़िम्मेदारी न उठानी पड़े। राम माने सत्य होता है। ये बिल्कुल वही बात है जहाँ श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, “नियतं कुरु कर्म,” वही है कि तुम्हारा कर्म सत्य मात्र के केंद्र से आना चाहिए। वही बात वहाँ कही जा रही है कि वही होगा अंततः जिसमें सत्य है। बाक़ी मिथ्या है, उसे काल ध्वस्त करके रहेगा। पर उसको हमने भाग्यवाद की भेंट चढ़ा दिया।
और इतनी बेईमानी घुस गई है हमारे भीतर हर चीज़ में। हर चीज़ में, कुछ बोला जाए तो कहेंगे, नहीं, नहीं, हम भी साइंटिफ़िक हैं। हमारी साइंस में कोई कमी थोड़ी है। हम भी साइंटिफ़िक हैं। ये क्यों बोल रहे हो हम साइंटिफ़िक नहीं हैं? अच्छा तो ये नींबू‑मिर्ची क्या लटका रखा है? तुम साइंटिफ़िक हो तो गाड़ी के आगे। “इसमें बहुत गहरी साइंस है आप। पश्चिम को तो नई‑नई साइंस मिली है। हमारे तो करोड़ों साल पुराने पुराण हैं। उनमें सब।”
नहीं कैसे? देखो, नींबू में होता है न साइट्रिक एसिड। हाँ तो? “गाड़ी किसकी बनी होती है?” लोहे की। “लोहे में क्या लगता है?” जंग। “तो ये साइट्रिक एसिड से जंग छूट जाएगा। तुम समझोगे नहीं हमारे पुरखे बड़े ज्ञानी थे। तो मिर्ची‑मिर्ची में क्या है? मिर्ची में क्या है? हाँ, आप एक मिर्ची लीजिए। उसका डंठल तोड़िए। उसको दूध में डालिए। देखिएगा, दही न बन जाए तो। आए हैं बहस करने?”
नहीं, सर, लेकिन इसका वहाँ गाड़ी के आगे मिर्ची लटकाने से क्या संबंध? “देखिए, आप हमारी आस्था पर सवाल न उठाएँ। जितना समझाना था, आपको समझा दिया। आगे नहीं समझ में आ रहा तो आप मूर्ख हैं। चलिए, निकलिए यहाँ से। धर्मद्रोही।”
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। इसी से आई थिंक जुड़ा हुआ एक सवाल है, अबाउट मिस्टिसिज्म, बिलीफ़ इन समथिंग एल्स, सम आत्मा, जीवात्मा एंड ऑल दीज़ थिंग्स। पहले मैं सोचती थी कि एजुकेशन से शायद कुछ फ़ायदा होगा और अंधविश्वास कम होगा। लेकिन अब एक्सपीरियंस ने वो तो भ्रांति हटा दी है। बिकॉज़ अपनी फीमेल फ़्रेंड्स में मैंने ये काफ़ी देखा है कि दे फॉल फॉर, क्या बोल सकते हैं कि डिफ़रेंट काइंड्स ऑफ़; मतलब, इफ़ दे आर नॉट रिलिजियस तो वो इस तरीके की चीज़ें, एनर्जी हीलिंग, क्रिस्टल्स इन सब चीज़ों में विश्वास कर रही हैं। और इन सब से हॉरोस्कोप से रिलेटेड, सन-साइन में बहुत ज़्यादा बिलीव करती हैं लड़कियाँ। लड़के भी करते हैं, बट मोर ऑफ़न देन नॉट।
मैंने अभी मतलब ये देखा है, ऑब्जर्व किया है, इट कैन बी रोंग, बट कि वुमेन फॉल फॉर दिस टैरो कार्ड रीडिंग और कोई है जो आपके ऊपर एंजल्स, 11-11। इन सब चीज़ों का बहुत ज़्यादा चलन हो गया है। यंग लोगों में भी बहुत ज़्यादा ये सब हो गया है। तो मतलब, आप कैसे देखते हैं इस चीज़ को?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जहाँ कहीं भी, जो भी व्यक्ति अपने आप को कमज़ोर घोषित कर चुका होगा वो उतना ज़्यादा इन सब में फँसेगा। क्योंकि इन सब उपायों के मध्य में बैठी हुई है, इरिस्पॉन्सिबिलिटी।
आपने कहा, इसमें लड़कियाँ ज़्यादा जाती हैं। जिस देश में लड़कियाँ अपने आप को जितना कमज़ोर मान चुकी होंगी वो उतना ज़्यादा भाग्य के भरोसे जिएँगी न? क्योंकि अपने भरोसे तो अब जिया नहीं जा सकता। मैं कौन हूँ? मैं तो कमज़ोर हूँ। तो भाग्य के भरोसे जीना है तो फिर अब उसमें, ये चाहे क्रिस्टल गेजिंग हो, चाहे एंजल थेरेपी, जो भी होता हो। ये सब करना ही पड़ेगा न, क्योंकि अपने दम पर तो कुछ हो नहीं सकता, मैंने मान लिया है। क्यों?
क्योंकि समाज ने मुझे इतना दबा के रखा। मैं लड़की, मुझे इतना दबा के रखा, इतना दबा के रखा कि मैंने ये बात आत्मसात कर ली है, इम्बाइब कर ली है, कि मेरी ज़िंदगी मेरे चलाए तो चलनी है नहीं। मैं तो कठपुतली हूँ। तो मेरे चलाए नहीं चलनी। फिर भी कुछ अच्छी‑अच्छी चीज़ें हो जाएँ ज़िंदगी में तो अच्छा रहे। तो अच्छी चीज़ें फिर कैसे होंगी? मन्नतें माँगो। ये सब हज़ार तरीक़े की जो न्यू‑एज सुपरस्टिशंस हैं, इनको ट्राई करो। ऑरा रीडिंग और ये और वो और पचास चीज़ें।
इन सब के केंद्र में, समझिए अच्छे से, जो साइकोलॉजिकल डिसेबिलिटी बैठी है वो यही है: “आई एम वीक, आई एम वीक,” और कुछ नहीं है। और ये नए‑नए तरीके से सामने आएगा। पहले जो अंधविश्वास फैलाते थे वो हमारे मन में छवि ये थी कि गाँव में कोई ओझा वग़ैरह है, वो जादू‑टोना कर रहा है और झाड़ू‑वाड़ू से मार रहा है। हम हँसते थे। कहते थे, देखो, बेचारे जो ग़रीब होते हैं, अनपढ़ होते हैं, उनको फँसा लिया। अब यही काम मेट्रोस में होता है और इंग्लिश‑स्पीकिंग पापुलेशंस में होता है। वहाँ बहुत सोफिस्टिकेटेड तरीके से होता है, बहुत ग्लैमरस तरीके से होता है। लेकिन सेंटर वही है, सेंटर वही है। “आई डोंट हैव द गट्स टू क्वेश्चन एंड नो। आई फाइंड इट मोर कन्वीनिएंट टू बो डाउन, एक्सेप्ट एंड टेक सर्टेन स्क्रैप्स।”
अपने दम पर ज़िंदगी जीना। अपने निर्णय लेना और जो भी फिर उन निर्णयों का अंज़ाम हो, उसको छाती पर झेलना। अगर ये दम नहीं रहेगा तो फिर भाग्यवाद रहेगा।
प्रश्नकर्ता: तो इसमें मतलब ये भी देखा है मैंने कि जैसे एक‑दो बार, मतलब फ्रेंड से बात भी हुई है इस बारे में। में आई क्वेश्चनड देम कि अनएग्ज़ामिन्ड बिलीव्स का क्या मतलब, वो होता है प्रॉब्लम। पर कुछ ज़्यादा, रीजन का कुछ ज़्यादा बहुत असर होता नहीं है उनके ऊपर। अगर मैं कुछ बताती हूँ कि इसका मतलब ये नहीं होता है और इस तरीके से नहीं करना चाहिए, तो उसका कुछ बहुत ज़्यादा।
आचार्य प्रशांत: देखिए एक हज़ार साल तक, एक हज़ार साल तक; मैंने दसवीं शताब्दी से शुरू किया, एक हज़ार साल तक भारत में यही‑यही सब उल्टी‑पुल्टी बिलीफ्स का नंगा नाच चलता रहा न। बीच में बहुत लोग आए होंगे, समझाने वाले भी। हम जानते हैं, रिलीज़ियस रिफॉर्मर्स, सोशल रिफॉर्मर्स को, जानते हैं न। नहीं सुना, तो क्या रहा? फिर तो वक़्त अपना थप्पड़ मारेगा ही। आ गई ग़ुलामी, हो गई दुर्दशा।
हमने कहा कि जब यहाँ पर आए अंग्रेज, तो औसत जो प्रति व्यक्ति आय थी भारतीय की, वो एक अंग्रेज की प्रति व्यक्ति आय से मुश्किल से 20-30% कम थी। सौ साल बीतते‑बीतते 85% कम हो गई थी। भीतर से तो हम कमज़ोर थे ही, बाहर से भी ग़रीब कर दिए गए, ग़ुलाम ही नहीं ग़रीब भी। ये होता है, फिर नतीजा। नहीं सुनना चाहती हैं वो रीजन की। तो वक़्त थप्पड़ मारेगा न, ग़ुलाम भी बनोगे, ग़रीब भी बनोगे और बेइज़्ज़ती भी झेलनी पड़ेगी दुनिया भर की, डॉग्स एंड इंडियंस नॉट अलाउड। ग़ुलामी भी मिलेगी, ग़रीबी भी मिलेगी, बेइज़्ज़ती भी मिलेगी। और मैं बोल रहा हूँ बार‑बार, मुझे बड़ी चिंता होती है कि हम जा किस दिशा रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: और इस‑इन सब चीज़ों में जैसे योग और इन सब का भी इन्वॉल्वमेंट कर लेते हैं लोग। आई सॉ रिडिकुलस प्रैक्टिस ऑफ़ पीपल, डूइंग योग अलोंग विद बुद्धा बोल्स, चटिंग और वो वाइब्रेशंस और वो सब चीज़ भी उसके अंदर सब मिक्स हो जाती है।
आचार्य प्रशांत: इन सब चीज़ों में जो सेंट्रल टेंडेंसी है, वो एक ही है। कुछ हो रहा है, जिसको मुझे जानने की ज़रूरत बिल्कुल नहीं है, और इसको नाम दिया जाता है मिस्टिसिज़्म का।
मिस्टिसिज़्म का मतलब ये नहीं है कि आपने एक ख़ास किस्म का सुगंधित, रूमानी ख़्याल पकड़ लिया है। मिस्टिसिज़्म तब है, जब इतनी गहराई से जान लो कि विचार की ज़रूरत ही न रह जाए। वो मिस्टिसिज़्म है। मुझे बहुत अच्छे से पता है, मैं क्या कर रहा हूँ; जानता हूँ और इसलिए पूरे प्रेम में कर रहा हूँ। इसलिए भविष्य में क्या होगा, इसका मुझे विचार ही नहीं आता। ये मिस्टिसिज़्म है।
तो मिस्टिसिज़्म भी ज्ञान से उपजता है। समझ रहे हैं बात को? मैं भली‑भाँति जानता हूँ मैं क्या कर रहा हूँ। इसलिए अब भविष्य में क्या होगा, ऐसा कोई ख़्याल मुझे आता ही नहीं। ये मिस्टिसिज़्म है। मिस्टिसिज़्म ये नहीं है कि मैं फलाने‑फलाने काम करुँगा, तो भविष्य में कुछ अच्छा हो जाएगा। भविष्य में कुछ अच्छा हो जाएगा, ये तो क्या है? ये एक थॉट है।
मिस्टिसिज़्म एक ख़ास किस्म का प्लेज़रेबल थॉट नहीं होता। मिस्टिसिज़्म इज़ फ़्रीडम फ्रॉम थॉट इटसेल्फ, एंड दैट फ़्रीडम कम्स नॉट बिकॉज़ यू हैव बिकम अनथिंकिंग, बट बिकॉज़ यू आर टोटली इमर्ज इन योर इंक्वायरी। बहुत‑बहुत सही तरीके से आप जानते हो। सौ बार सवाल पूछ रहे हो लगातार, और चूँकि आपको पता है कि सवाल पूछना ज़रूरी है, जानना ज़रूरी है। तो इसीलिए सवाल पूछने का अंज़ाम क्या होगा, इसकी आपको फ़िक़्र ही नहीं है, उसका थॉट ही नहीं आता आपको। ये है मिस्टिसिज़्म।
मिस्टिसिज़्म ये नहीं है, “यू नो देयर आर थिंग्स। दैट एक्सिस्ट, बट यू कैन नॉट नो।” ये मिस्टिसिज़्म नहीं है, ये मूर्खों को बेवकूफ़ बनाने की निंजा टेक्निक है। इसका कोई जवाब देके दिखाओ, इसको न तो प्रूफ़ कर सकते हैं, न डिस्प्रूव कर सकते हैं। “यू नो देयर आर थिंग्स दैट एक्सिस्ट, बट यू कैन नॉट नो देम।”
नहीं, इसको कैसे माने और कैसे न माने? ये क्या बोला है? तुम्हें पता भी है, तुम क्या बोल रहे हो? “यू नो देयर आर थिंग्स दैट एक्सिस्ट, बट यू कैन नॉट नो देम।” और ये एपिस्टेमिकली भी गलत है क्योंकि एक्ज़िस्टेंस का मतलब ही है वो जो जाना जा सकता है। तो आपने एक फ़िलॉसोफिकल डिस्टॉर्शन भी करा है।
आप कह रहे हो, यू नो देयर आर बीइंग्स दैट एक्सिस्ट बट यू कैन नॉट नो देम। इफ वी कैन नॉट नो देन दे डोंट।
श्रोता: एग्ज़िस्ट।
आचार्य प्रशांत: एग्ज़िस्टेन्स का मतलब ही है, जिसको किसी-न-किसी विधि से प्रायोगिक तरीके से जाना जा सकता हो। वरना उसको हम एग्ज़िस्टेंट, अस्तित्वमान, बोल ही नहीं सकते। पर इस तरह की मूर्ख बातों को कह दिया जाता है, ये मिस्टिसिज़्म है। ये मिस्टिसिज़्म नहीं है, ये मूर्खता है।
“सर्टेन थिंग्स कैन बी नोन ओनली थ्रू बिलीफ़।” फिर से आपने एपिस्टेमिक फ्रॉड किया। आपने कहा, नोइंग थ्रू बिलीफ़। बिलीफ़ तो कोई रास्ता होता ही नहीं नोइंग का। पर चूँकि लोगों ने फ़िलॉसफ़ी नहीं पढ़ रखी है, तो आपने कुछ एक्सेंट वग़ैरह मार करके उनको इम्प्रेस कर लिया। “यू नो देयर आर सर्टेन थिंग्स दैट कैन बी नोन ओनली थ्रू बिलीफ़।” सर, दिस इज़ एपिस्टेमिक फ्रॉड। बिलीफ़ अगर है तो फिर नोइंग की ज़रूरत क्या है? बिलीफ़ का तो मतलब है कि मैंने मान लिया। अब जान के क्या करोगे, मान तो लिया ही है। मान लिया, अब क्या? तो “नोन थ्रू बिलीफ़” ये तो बात ही बहुत सेंसलेस है।
ये मिस्टिकल नहीं होता ये सब। मिस्टिसिज़्म माने बेपरवाही, मिस्टिसिज़्म माने मौज है, और कोई पूछे “क्यों है?” तो कारण भी नहीं है। “आपको डर नहीं लग रहा?” नहीं। “नहीं, क्यों नहीं लग रहा?” डर लगने का कोई कारण होगा। डर न लगने का तो कोई कारण नहीं होता, ये मिस्टिसिज़्म है, क्योंकि डर एक थॉट होता है, ख़्याल होता है। वो ख़्याल मुझे नहीं आ रहा, और कोई वजह नहीं है कि मुझे डर नहीं लग रहा। बेवजह डर नहीं लग रहा।
“भगवद्गीता पर दिल आ गया है।” हाँ। “क्यों? क्या मिलेगा?” पता नहीं, बस प्रेम है तो है। प्रेम है, तो है; ये मिस्टिसिज़्म है, निष्कामना, श्रद्धा, बेपरवाही। वो नहीं मिस्टिसिज़्म है। “आई कैन सेंस सम नेगेटिव एनर्जी हियर यस, यस, यस, आई कैन सेंस सम नेगेटिव एनर्जी हियर।” हँस क्या रहे हो? अभी तुम्हारे सामने आकर यहाँ बाबा जी शुरू हो जाए न, सब ऐसे हो जाओगे। किथे? दो-चार सीट के नीचे। “आई कैन सेंस सम नेगेटिव एनर्जी हियर।”
ऐसे ही थोड़ी अंधविश्वास-भरी फ़िल्में बनती हैं और वो मेगा-हिट हो जाती हैं। “आई कैन स्मेल अ घोस्ट।” हँस लो, लेकिन अभी इतने केंद्रित हुए नहीं हो, दो-चार ऐसे ही मिलकर घेर के तुम्हारे साथ करने लग जाएँगे न, वहीं पर मान लोगे।
या कम से कम ये कहोगे, कि “क्या पता? नहीं, मैंने उसमें पार्टिसिपेट नहीं किया, पर पता नहीं, मैं तो बस हट गया वहाँ से। पता नहीं क्या चल रहा था।” ये थोड़ी हिम्मत होगी खुल के बोलने की “मूर्खो, उठो, यहाँ से निकलो।” अंधविश्वास अज्ञान भर नहीं होता, गहरी कुटिलता होता है। गहरी, गहरी कुटिलता।
अभी कहीं पर एक वो किसी ने रील भेजी, कि उसमें वो एक आता है, उसका मुँह ऐसा *(टेढ़ा)*है। तो फिर वो एक सज्जन आते हैं। बोलते हैं, “हालेलूया! हालेलूया! हालेलूया!” और उसका मुँह ठीक हो जाता है, उठकर दौड़ना शुरू कर देता है। तुम्हें क्या लग रहा है ये सिर्फ़ अज्ञान है? नहीं। ये बहुत गंदे क़िस्म की चालाकी है। ये साज़िश है। आप उसको ये नहीं बोल सकते कि वो बेवकूफ़ है। वो बेवकूफ़ नहीं है, वो बदमाश है, वो शातिर बदमाश है। और कितनी रिहर्सल करी होंगी, भाई, ये करने के लिए! सोचो, ऐसे को आप सिर्फ़ बेवकूफ़ बोलोगे क्या?
ये तो वेल-प्रैक्टिस्ड एंड रिहर्स्ड कॉन्स्पिरेसी है, कि हम ऐसे करेंगे, फिर ऐसे करेंगे, और इस तरह से वहाँ पर जो जनता बैठी है, उसको बेवकूफ़ बना देंगे कि इसका “हालेलूया” मार के इसका भूत उतार दिया।
ऐसे ही मत हुआ करिए, जब ये सब बातें कर रहा हूँ न। एक तो पता नहीं क्यों भूत और भगवान आप लोगों ने एक ही तल पर रख दिया है। भाई, भगवान माने सत्य, ब्रह्म। आपको बड़ा धर्म-संकट हो जाता है। कहते हैं, कि “अगर भूत नहीं माना, तो फिर भगवान भी नहीं माना। तो मतलब नास्तिक हो गए। तो इसलिए नास्तिक न होने के लिए भूत मानना ज़रूरी है।” ये कौन-सी आस्तिकता है जिसमें भूत माने जाते हैं? और भगवान माने, तो फिर बोल रहा हूँ, भगवान माने तो सत्य होता है, जो यहाँ रहता है।
ये जोड़ा कहाँ से बना दिया कि भगवान है तो भूत भी होगा। भूत है तभी भगवान होगा, तो मानना तो ज़रूरी है। ये कौन-सा तर्क है? विज्ञान की ताक़त के आगे कुछ नहीं टिक पाएगा; ये आस्था, ये विश्वास, ये मन्नतें, ये रस्में, ये रिवाज़। और विज्ञान कोई चीज़ नहीं होती, विज्ञान एक एटीट्यूड होता है। विज्ञान वो नहीं होता कि आपने मोबाइल ख़रीद लिया है, तो बोलिए, “विज्ञान मेरी जेब में है।” विज्ञान एक एटीट्यूड होता है, साइंटिफ़िक टेम्परामेंट।
जिस देश के पास, जिस क़ौम के पास, जिन लोगों के पास, जिस राष्ट्र के पास साइंटिफ़िक एटीट्यूड नहीं होगा, उसको कैसे बचाएँगे।
प्रश्नकर्ता: सत् श्री अकाल, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन, आज हमने बात की जीएमटी की और क्रोनोमीटर की। जब वेस्टनर्स ने सिर्फ़ जीएमटी और क्रोनोमीटर से जिस तरीके से, अभी हिंदुस्तान में हम चल रहे हैं, वही सिस्टम नहीं इजाद किए। उन्होंने डे-लाइट सेविंग और टाइम ज़ोन्स भी क्रिएट किए।
सर, आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं, और हमारी इकॉनमी साइज में भी छोटी नहीं है, और क्षेत्रफल के हिसाब से भी हम सातवें पायदान पर आते हैं। तो क्यों आज हम नहीं देखते कि ये कोई मेजर टॉपिक बनकर, या कोई बड़ा या छोटा डिस्कशन बनकर, टाइम ज़ोन का और डे-लाइट सेविंग का कोई डिस्कशन नहीं हो रहा है?
क्योंकि हम, जैसे हमारे रोज़गार में ऑस्ट्रेलिया, यूएस से मेरा काम रहता है, तो वो लोग टाइम ज़ोन से काफ़ी अपना काम कंफ़र्टेबली कर लेते हैं। और टाइम हमें डे-लाइट सेविंग के थ्रू उनको कॉन्टैक्ट करना होता है। तो हम तो एडजस्ट कर रहे हैं उनके अकॉर्डिंग, लेकिन वो लोग इन चीज़ों को अच्छी तरीके से, एफिशिएंटली यूज़ करके अपनी इकॉनमी को इफ़ेक्टिवली आगे भी बढ़ा पा रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं, उसकी वजह बहुत सीधी है। आप जो बता रहे हैं न, वो एफिशिएंसी इम्प्रूवमेंट के मेजर्स हैं। इससे जो वर्कफ़ोर्स की प्रोडक्टिविटी है, जो इकॉनमी की एफिशिएंसी है, वो बढ़ती है। उसको बढ़ाने की ओर ध्यान होगा, तब न हम बढ़ाएँगे। हमारा उसको बढ़ाने की ओर कोई ध्यान ही नहीं है, हमारी राष्ट्रीय ऊर्जा बहुत दूसरे मुद्दों की ओर जा रही है।
आप जो मुद्दा उठा रहे हो, 99% लोगों को इससे साहब कोई सरोकार नहीं है। यहाँ सरोकार इन बातों से है कि वो मेरे क्षेत्र में फलानी जाति का कैंडिडेट खड़ा हो गया है; वो कहीं जीत ना जाए। आप बात समझ रहे हैं?
प्रश्नकर्ता: सर, लेकिन फिर हमने नीति आयोग जैसे डिपार्टमेंट्स हमारे, उनका जो मेजर मिशन है, वो बेसिकली इकॉनमी की तरफ़ प्रायोरिटी।
आचार्य प्रशांत: देखिए, इंस्टिट्यूशंस तो हमारे पास बहुत अच्छे-अच्छे हैं। हमारे पास नीति आयोग भी है, हमारे पास ज्यूडिशियरी भी है, हमारे पास पार्लियामेंट भी है। उनके भीतर लेकिन बैठेगा कौन? हमें ही तो बैठना है न।
इंस्टिट्यूशंस तो बहुत अच्छे हैं और वो इंस्टिट्यूशंस कुछ हद तक अच्छे इसलिए हैं क्योंकि पारंपरिक नहीं हैं। ये सारे जो इंस्टिट्यूशंस हैं न, चाहे इलेक्शन कमीशन हो, फ़ाइनेंस कमीशन, नीति आयोग, वो पारंपरिक नहीं हैं। उनमें से ज़्यादातर वो हैं, जो हमने यूरोप से ही, कॉपी तो नहीं बोलूँगा बट इंस्पायर्ड। और इंस्पिरेशन में कोई बुराई नहीं होती।
और यही वजह है कि आप पाते हैं कि आज बहुत सारे लोग, जो मदर इंस्टिट्यूशन है, कॉन्स्टिट्यूशन, उस मदर इंस्टिट्यूशन के ही ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं। वो कह रहे हैं, इसमें भारतीय परंपराएँ तो दिखाई नहीं दे रहीं न। भारतीय परंपरा क्या नहीं है? इसमें इक्वलिटी क्यों लिख दिया? आदमी-औरत इक्वल हो सकते हैं कभी? क्यों लिखा है? ये संविधान में इक्वलिटी लिख दिया है। ये सारी इतनी जातियाँ इक्वल कभी हो सकती हैं? क्यों लिख दिया है?
वो ये अपने मुँह से नहीं बोलेंगे, पर कुल मिला-जुला कर बात यही है। बात यही है। तो वही होता है, जिस ओर ध्यान होता है। हमारा ध्यान था, अभी बात कर रहे थे न, मुग़लों का ध्यान था कि बड़े-बड़े मक़बरे बनाएँगेक् तो बड़े-बड़े बना दिए मक़बरे। और आप; हुमायूँ का मक़बरा है, आप ग्रेनिच जाएँगे, जिसकी इतनी देर से हम बात कर रहे हैं, हुमायूँ के मक़बरे से छोटा है। पर उस छोटी-सी जगह ने दुनिया जीत ली। वो एक ऑब्ज़रवेटरी है, छोटी-सी। जितना बड़ा इस यूनिवर्सिटी का कैंपस है, इससे छोटी है।
प्रश्नकर्ता: आज उसका नुकसान ही ये है, सर। हमारे पास बिहार जैसे, पिछले दीपोत्सव में भी बात हुई, कि एनुअल इनकम ही पर कैपिटा 56,000 है। तो ऐसे पॉवर्टी पॉटहोल्स हमारे देश में कई निर्मित हो गए हैं।
आचार्य प्रशांत: सबसे ज़्यादा वहाँ होंगे, जहाँ सबसे ज़्यादा बात होगी परंपरा की और पुराने संस्कार की। और जहाँ ये माना जाएगा कि हम तो पुराने हिसाब पर चलते हैं, हम पुराने ज्ञानी हैं, हमें पता है, हमें मत बताओ।
वैसे आपको एक मज़ेदार बात बताऊँ, यही वहाँ भी चल रहा था, जो यूरोप में भी नई रोशनी की शुरुआत होती है। आपको मालूम है कैसे होती है? वहाँ भी फ़िलॉसफ़ी मर गई थी, थियोलॉजी आ गई थी। फ़िलॉसफ़ी तो ग्रीस में थी, ठीक है? और क्रिश्चियनिटी के आने के कुछ सौ सालों बाद ग्रीक में जो फ़िलॉसफ़ी का पूरा माहौल था, वो बिल्कुल ध्वस्त हो गया। सब समाप्त हो गया। और उसकी जगह चलने लग गई थियोलॉजी।
थियोलॉजी और फ़िलॉसफ़ी में क्या अंतर होता है? फ़िलॉसफ़ी कुछ मानती नहीं है, वो सवाल करती है। और थियोलॉजी में कुछ मान लिया जाता है पहले ही। जहाँ कुछ पहले ही मान लिया, फ़िलॉसफ़ी नहीं कहलाती वो। इसीलिए जब आप लोग बोलते हैं न कि नॉन-डुअलिस्ट फ़िलॉसफ़ी होती है और डुअलिस्ट फ़िलॉसफ़ी होती है, अद्वैत दर्शन होता है और द्वैत दर्शन होता है, तो आप गलत बोल रहे हैं। दर्शन तो सिर्फ़ अद्वैत है। जहाँ द्वैत आ गया, वहाँ विश्वास आ गया।
क्या विश्वास आ गया? क्रिएटर बैठा हुआ है। ये-ये-ये, ये इन्क्वायरी थोड़ी है, ये तो बिलीफ़ है। तो थियोलॉजी आ गई थी यूरोप में। जानते हैं, जो रेनैसाँ हम यूरोप के लिए नई सुबह और भारत के लिए गहरी काली रात लेकर आया, वो शुरू ही कैसे हुआ था? जो पुराने ग्रीक फ़िलॉसफ़र्स थे, जिनमें से कईयों की हम आपसे बात कर चुके हैं, जो पुराने ग्रीक फ़िलॉसफ़र्स थे, यूरोप ने उनकी किताबें दोबारा उठाईं, कुछ लोगों के प्रयास से।
बोले, ये हटाओ सब थियोलॉजी। ये सब जो चर्च के पादरी वग़ैरह खड़े हो जाते हैं, कहते हैं, ऐसे है, वैसे है; गॉड ने दुनिया ऐसे रची, आदमी आया, औरत आई, फिर ये हुआ, फिर वो हुआ, पचास तरह की कहानियाँ जो बताते हो। हमें कहानी नहीं चाहिए। हमें जो असली फ़िलॉसफ़ी है, पुरानी, हमें वापस जाना है। हमें सुकरात के पास वापस जाना है।
तो जो ग्रीक स्पिरिट ऑफ़ इन्क्वायरी थी, वही समझ लो कि डेढ़ हज़ार साल बाद वापस आई, और उसी ने यूरोप का पुनरुत्थान किया। आज भारत को भी उन्हीं उपनिषदों को वापस लाना पड़ेगा, अगर पुनरुत्थान करना है तो। इंडियन रेनैसाँ चाहिए हमें।
रेनैसाँ का मतलब ही मालूम है क्या होता है? रेनैसाँ शब्द का मतलब क्या होता है? फिर से जानना, फिर से जागना, री, दोबारा। आज हमें वेदान्त, उपनिषद् दोबारा चाहिए। हमें रिक्लेम करना है उनको। नहीं तो जो एक बार हुआ है हमारे साथ, इतना लंबा ग़ुलामी का काल, वो दोबारा भी हो सकता है। सावधान रहना होगा।
सावधान भी वैसे नहीं कि सीमा पर सजग प्रहरी खड़ा हो गया। वैसी वाली सावधानी से काम नहीं चलेगा। हमें हमारा रेनैसाँ चाहिए।